रूद्राक्षजाबालो उपनिषद रूद्राक्ष से
संबंधित उपनिषद है यह उपनिषद सामवेदीय शाखा के अंतर्गत आता है जिसमें
भगवान शिव के 'रुद्राक्ष' की महत्ता को व्यक्त किया गया है. इस उपनिषद
में रूद्राक्ष से संबंधित अनेक प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है जिसमें
रूद्राक्ष की उत्पत्ति उसका आकार, उसे धारण करने का तरीका उससे प्राप्त
फल होने वाले फलों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है. इस उपनिषद
में भुसुण्ड और 'कालाग्निरुद्र' के मध्य होने वाले संवादों के द्वारा इसे
कथा का रूप प्राप्त होता है. रुद्राक्ष उत्पत्ति | Origin Of Rudraksha
रूद्राक्षजाबालो उपनिषद के प्रारंभ में भुसुण्ड, कालाग्निरूद्र से प्रश्न करते हैं कि कृपा कर आप मुझे रुद्राक्ष के विषय में बताएं यह क्या है व कहां से आया इसके क्या लाभ हैं इन सभी तथ्यों को आप मेरे समक्ष प्रस्तुत करें. इस पर प्रभु कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं रूद्राक्ष की उत्पत्ति मेरे द्वारा ही हुई है एक बार जब त्रिपुरासुर का वध करते हुए मेरे नेत्रों में से जल की कुछ बूंदे आँसू के रूप में पृथ्वी पर जा गिरी और वह बूंदे रुद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गईं जिस प्रकार रूद्राक्ष की उत्पत्ति हुई.
रूद्राक्ष नाम का उच्चारण मात्र ही सभी फलों को प्रदान करने वाला है इसके नाम को जपने से दान में दस गायों को देने जितना लाभ प्राप्त होता है. जब मैने अपनी आँखें एक हजा़र वर्षों तक बंद रखीं तब मेरी पलकों से, पानी की कुछ बूंदें नीचे गिरी तो वह रूद्राक्ष बनीं.
यह रूद्राक्ष भक्तों के समस्त पापों नष्ट कर देता है. इसे पहनकर सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. रूद्राक्ष को देखने भर से ही लाखों कष्ट दूर हो जाते हैं और इसे धारण करने पर करोडों लाभ प्राप्त होते हैं तथा इसे पहनकर मंत्र जाप करने से यह और भी ज्यादा प्रभावशाली होता है.
रूद्राक्ष वर्णन | Description Of Rudraksha
जो रूद्राक्ष आंवले के आकार जितना बड़ा होता है वह रूद्राक्ष अच्छा होता है, जो रूद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. यह रूद्राक्ष माला के आकार के बारे में मेरा विचार है.
इसके बाद वह कहते हैं कि ब्राह्मण सफेद रूद्राक्ष है. लाल एक क्षत्रिय है. पीला एक वैश्य है और काले रंग का रूद्राक्ष एक शूद्र है.इसलिए, एक ब्राह्मण को सफेद रूद्राक्ष , एक क्षत्रिय को लाल, एक वैश्य को पीला और एक शूद्र को काला रूद्राक्ष धारण करना चाहिए.
उन रूद्राक्ष-मोती को उपयोग में लाना चाहिए जो सुन्दर, मजबूत, बड़ा, तथा कांटेदार हो और उन रूद्राक्ष को नहीं लेना चहिए जो कहीं से टूटा हो या उस पर कीडा लगा है या कांटे बिना हो उचित नहीं होता, जिस रूद्राक्ष में प्रकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें खुद छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रूद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रूद्राक्ष को गले में पहने तो तात्पुरषा मंत्र जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए यह कल्याणकारी होता है.
रूद्राक्ष के विभिन्न रूप | Various Forms Of Rudraksha
भुसुण्ड, फिर से 'कालाग्निरुद्र' से पूछते हैं कि रूद्राक्ष माला के रूप एवं प्रभाव क्या होते हैं आप मुझे इसके सभी रहस्यों का ज्ञान प्रदान करें. ‘कालाग्निरुद्र' उनसे कहते हैं एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्व का रूप होता है. दोमुखी रुद्राक्ष को अर्धनारीश्वर कहते हैं इसे धारण करने से शक्ति एवं शिव दोनो की प्राप्ति होती है, तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय है इससे अग्नि का आशीर्वाद प्राप्त होता है, चारमुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा का रूप है,
पंचमुखी रुद्राक्ष पांच मुख वाले शिव का रूप है जो हत्या जैसे पाप को भी नष्ट कर देता है छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय एवं गणेश का रूप है इसे धारण करके भक्त धन, स्वास्थ्य, बुद्धि व ज्ञान पाता है, सप्तमुखी रुद्राक्ष सात लोकों, सात मातृशक्ति का रूप है इसे पहनकर भक्त धन, स्वास्थ्य और मन की पवित्रता को पाता है, अष्टमुखी रुद्राक्ष आठ गुणों का, प्रकृति का रूप है इसे पहन के भक्त इन देवों की कृपा प्राप्त करता है, नौमुखी रुद्राक्ष नौ शक्तियों का रूप है इसे धारण करके भक्त को नौ शक्तियों का अनुग्रह उपलब्ध हो जाता है, दसमुखी रुद्राक्ष यम देवता का,
ग्यारहमुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्र का रूप माना गया है इसे धारण करके धन में वृद्धि की कृपा प्राप्त होती है, बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णु एवं बारह आदित्यों का प्रतीक माना गया है इसे उपयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, तेरहमुखी रुद्राक्ष कामदेव का रूप माना गया है इसे धारण करने से समस्त मानोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा चौदहमुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र भगवान के नेत्रों से हुई मानी जाती है इसे धारण करने से रोगों का नाश होता है.
रूद्राक्ष धारण के नियम | Rules For Wearing Rudraksha
रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए उसे मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का त्याग करना चाहिए कर देना चाहिए. रूद्राक्ष को पूर्णिमा जैसे शुभ दिनों में धारण करने पर व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. रूद्राक्ष का आधार ब्रह्मा जी हैं उसकी नाभि विष्णु हैं , उसके चेहरे रुद्र है और उसके छिद्र देवताओं के होते हैं.
एक बार संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं.
तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रूद्राक्ष कहा गया
इस रूद्राको छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोंडों गुना बढ़ जाता है.
रूद्राक्षजाबालो उपनिषदमहत्व । Rudraksha Jabala Upanishad Importance
रूद्राक्षजाबालो उपनिषद एक महत्वपूर्ण उपनिषद है जो रूद्राक्ष के महत्व को स्पष्ट करता है इस उपनिषद में रूद्राक्ष की पूर्ण विवेचना प्रस्तुत कि गई है जिसमें इसकी उत्पत्ति इसे गुण इसके शुभ लाभ तथा धारण करने के नियम आदि बातों को बहुत ही सरल प्रकार से व्यक्त किया गया है इस उपनिषद का श्रवण एवं मनन करने से समस्त शुभ फलों की प्राप्ति होती है इसे पढने वाला गुरू की उपाद्धी पाता है मंत्रों का शिक्षक बनता है इस उपनिषद का किसी भी समय पठन पाठन शुभ फल की प्राप्ति कराता है तथा व्यक्ति के कई जन्मों के पापों को नष्ट कर. उसे गायत्री जाप के छह लाख मंत्रों के समान फल प्राप्त होता है.
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद रूद्राक्ष से संबंधित उपनिषद है यह उपनिषद सामवेदीय शाखा के अंतर्गत आता है जिसमें भगवान शिव के 'रुद्राक्ष' की महत्ता को व्यक्त किया गया है. इस उपनिषद में रूद्राक्ष से संबंधित अनेक प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है जिसमें रूद्राक्ष की उत्पत्ति उसका आकार, उसे धारण करने का तरीका उससे प्राप्त फल होने वाले फलों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है. इस उपनिषद में भुसुण्ड और 'कालाग्निरुद्र' के मध्य होने वाले संवादों के द्वारा इसे कथा का रूप प्राप्त होता है. रुद्राक्ष उत्पत्ति
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद के प्रारंभ में भुसुण्ड, कालाग्निरूद्र से प्रश्न करते हैं कि कृपा कर आप मुझे रुद्राक्ष के विषय में बताएं यह क्या है व कहां से आया इसके क्या लाभ हैं इन सभी तथ्यों को आप मेरे समक्ष प्रस्तुत करें. इस पर प्रभु कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं रूद्राक्ष की उत्पत्ति मेरे द्वारा ही हुई है एक बार जब त्रिपुरासुर का वध करते हुए मेरे नेत्रों में से जल की कुछ बूंदे आँसू के रूप में पृथ्वी पर जा गिरी और वह बूंदे रुद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गईं जिस प्रकार रूद्राक्ष की उत्पत्ति हुई.
रूद्राक्ष नाम का उच्चारण मात्र ही सभी फलों को प्रदान करने वाला है इसके नाम को जपने से दान में दस गायों को देने जितना लाभ प्राप्त होता है. जब मैने अपनी आँखें एक हजा़र वर्षों तक बंद रखीं तब मेरी पलकों से, पानी की कुछ बूंदें नीचे गिरी तो वह रूद्राक्ष बनीं.
यह रूद्राक्ष भक्तों के समस्त पापों नष्ट कर देता है. इसे पहनकर सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. रूद्राक्ष को देखने भर से ही लाखों कष्ट दूर हो जाते हैं और इसे धारण करने पर करोडों लाभ प्राप्त होते हैं तथा इसे पहनकर मंत्र जाप करने से यह और भी ज्यादा प्रभावशाली होता है.
रूद्राक्ष वर्णन
जो रूद्राक्ष आंवले के आकार जितना बड़ा होता है वह रूद्राक्ष अच्छा होता है, जो रूद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. यह रूद्राक्ष माला के आकार के बारे में मेरा विचार है.
इसके बाद वह कहते हैं कि ब्राह्मण सफेद रूद्राक्ष है. लाल एक क्षत्रिय है. पीला एक वैश्य है और काले रंग का रूद्राक्ष एक शूद्र है.इसलिए, एक ब्राह्मण को सफेद रूद्राक्ष , एक क्षत्रिय को लाल, एक वैश्य को पीला और एक शूद्र को काला रूद्राक्ष धारण करना चाहिए.
उन रूद्राक्ष-मोती को उपयोग में लाना चाहिए जो सुन्दर, मजबूत, बड़ा, तथा कांटेदार हो और उन रूद्राक्ष को नहीं लेना चहिए जो कहीं से टूटा हो या उस पर कीडा लगा है या कांटे बिना हो उचित नहीं होता, जिस रूद्राक्ष में प्रकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें खुद छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रूद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रूद्राक्ष को गले में पहने तो तात्पुरषा मंत्र जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए यह कल्याणकारी होता है.
रूद्राक्ष के विभिन्न रूप
भुसुण्ड, फिर से 'कालाग्निरुद्र' से पूछते हैं कि रूद्राक्ष माला के रूप एवं प्रभाव क्या होते हैं आप मुझे इसके सभी रहस्यों का ज्ञान प्रदान करें. ‘कालाग्निरुद्र' उनसे कहते हैं एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्व का रूप होता है. दोमुखी रुद्राक्ष को अर्धनारीश्वर कहते हैं इसे धारण करने से शक्ति एवं शिव दोनो की प्राप्ति होती है, तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय है इससे अग्नि का आशीर्वाद प्राप्त होता है, चारमुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा का रूप है,
पंचमुखी रुद्राक्ष पांच मुख वाले शिव का रूप है जो हत्या जैसे पाप को भी नष्ट कर देता है छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय एवं गणेश का रूप है इसे धारण करके भक्त धन, स्वास्थ्य, बुद्धि व ज्ञान पाता है, सप्तमुखी रुद्राक्ष सात लोकों, सात मातृशक्ति का रूप है इसे पहनकर भक्त धन, स्वास्थ्य और मन की पवित्रता को पाता है, अष्टमुखी रुद्राक्ष आठ गुणों का, प्रकृति का रूप है इसे पहन के भक्त इन देवों की कृपा प्राप्त करता है, नौमुखी रुद्राक्ष नौ शक्तियों का रूप है इसे धारण करके भक्त को नौ शक्तियों का अनुग्रह उपलब्ध हो जाता है, दसमुखी रुद्राक्ष यम देवता का,
ग्यारहमुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्र का रूप माना गया है इसे धारण करके धन में वृद्धि की कृपा प्राप्त होती है, बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णु एवं बारह आदित्यों का प्रतीक माना गया है इसे उपयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, तेरहमुखी रुद्राक्ष कामदेव का रूप माना गया है इसे धारण करने से समस्त मानोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा चौदहमुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र भगवान के नेत्रों से हुई मानी जाती है इसे धारण करने से रोगों का नाश होता है.
रूद्राक्ष धारण के नि यम
रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए उसे मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का त्याग करना चाहिए कर देना चाहिए. रूद्राक्ष को पूर्णिमा जैसे शुभ दिनों में धारण करने पर व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. रूद्राक्ष का आधार ब्रह्मा जी हैं उसकी नाभि विष्णु हैं , उसके चेहरे रुद्र है और उसके छिद्र देवताओं के होते हैं.
एक बार संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं.
तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रूद्राक्ष कहा गया
इस रूद्राको छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोंडों गुना बढ़ जाता है.
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद महत्व
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद एक महत्वपूर्ण उपनिषद है जो रूद्राक्ष के महत्व को स्पष्ट करता है इस उपनिषद में रूद्राक्ष की पूर्ण विवेचना प्रस्तुत कि गई है जिसमें इसकी उत्पत्ति इसे गुण इसके शुभ लाभ तथा धारण करने के नियम आदि बातों को बहुत ही सरल प्रकार से व्यक्त किया गया है इस उपनिषद का श्रवण एवं मनन करने से समस्त शुभ फलों की प्राप्ति होती है इसे पढने वाला गुरू की उपाद्धी पाता है मंत्रों का शिक्षक बनता है इस उपनिषद का किसी भी समय पठन पाठन शुभ फल की प्राप्ति कराता है तथा व्यक्ति के कई जन्मों के पापों को नष्ट कर. उसे गायत्री जाप के छह लाख मंत्रों के समान फल प्राप्त होता है.
रुद्राक्ष को धारण करना या इसका उपयोग चिंता, कष्ट, दु:ख और पापों का अंत करने वाला माना गया है. शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष का असर और प्रभाव उसके रूप, रंग, आकार पर बहुत निर्धारित करता है. रुद्राक्ष चार रंग में प्राप्त होता है सफेद, लाल, पीला और काला. इसी प्रकार वर्ण के आधार पर भी रूद्राक्ष को विभाजित किया गया है. रुद्राक्ष का आकार उसके प्रभावों को सत्यापित करता है. आंवले के आकार जितना बड़ा रुद्राक्ष अच्छा होता है, जो रुद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रुद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक होता है. भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रुद्राक्ष को गले में पहने तो “तात्पुरषा मंत्र” जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए, यह कल्याणकारी होता है.
रुद्राक्ष जाबालोपनिषद में संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं. तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रुद्राक्ष कहा गया. इस रूद्राक्ष को छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोड़ों गुना बढ़ जाता है.
रुद्राक्ष का आकार विभाजन | Classification of Rudraksha on the Basis of Size
रुद्राक्ष को उसके आकार के आधार पर तीन श्रेणीयों में बांटा गया है.
प्रथम श्रेणी का रुद्राक्ष | First class Rudraksha
प्रथम श्रेणी का रुद्राक्ष उत्तम रुद्राक्ष कहा जाता है. इस रुद्राक्ष का आकार आंवले के फल के आकार के समान होता है. अत: इस प्रकार का रुद्राक्ष उत्तम श्रेणी में आता है.
द्वितीय श्रेणी रुद्राक्ष | Second class Rudraksha
दूसरी श्रेणी में आता है मध्यम दर्जे का रुद्राक्ष. जो रुद्राक्ष आकार में बेर के समान दिखाई दे वह रुद्राक्ष मध्यम श्रेणी का रुद्राक्ष कहा जाता है.
तृतीय श्रेणी का रुद्राक्ष | Third Class Rudraksha
तीसरे स्थान में रखा गया रुद्राक्ष निम्न श्रेणी के रुद्राक्ष में गिना जाता है. इसे निम्न श्रेणी का रुद्राक्ष कहते हैं. इस रुद्राक्ष का आकार चने के बराबर होता है.
रुद्राक्ष के आकार का महत्व | Significance of size in selection of Rudraksha
सभी रुद्राक्ष ही पापों को नष्ट कर शिव कृपा देने वाले होते हैं किंतु यदि उन्हें नियमानुसार धारण किया जाए तो वह चमत्कारी प्रभाव छोड़ते हैं. सही आकार, ठोस, रुद्राक्ष पहनना चाहिए. सुख-शांति एवं अच्छे भाग्य के लिए बेर के आकार का रुद्राक्ष अनुकूल माना गया है. पापों तथा अनिष्ट को दूर करने के लिए आंवले के आकार का रुद्राक्ष अच्छा माना जाता है. टूटा हुआ ,कीड़े लगा रुद्राक्ष उपयोग में नहीं लाना चाहिए. रंग, रुप, आकार के आधार पर रुद्राक्ष को एक से इक्कीस मुखी रुद्राक्ष का महत्व बताया गया है जिन्हें धारण करने से विभिन्न फलों की प्राप्ति होती है.
रूद्राक्षजाबालो उपनिषद के प्रारंभ में भुसुण्ड, कालाग्निरूद्र से प्रश्न करते हैं कि कृपा कर आप मुझे रुद्राक्ष के विषय में बताएं यह क्या है व कहां से आया इसके क्या लाभ हैं इन सभी तथ्यों को आप मेरे समक्ष प्रस्तुत करें. इस पर प्रभु कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं रूद्राक्ष की उत्पत्ति मेरे द्वारा ही हुई है एक बार जब त्रिपुरासुर का वध करते हुए मेरे नेत्रों में से जल की कुछ बूंदे आँसू के रूप में पृथ्वी पर जा गिरी और वह बूंदे रुद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गईं जिस प्रकार रूद्राक्ष की उत्पत्ति हुई.
रूद्राक्ष नाम का उच्चारण मात्र ही सभी फलों को प्रदान करने वाला है इसके नाम को जपने से दान में दस गायों को देने जितना लाभ प्राप्त होता है. जब मैने अपनी आँखें एक हजा़र वर्षों तक बंद रखीं तब मेरी पलकों से, पानी की कुछ बूंदें नीचे गिरी तो वह रूद्राक्ष बनीं.
यह रूद्राक्ष भक्तों के समस्त पापों नष्ट कर देता है. इसे पहनकर सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. रूद्राक्ष को देखने भर से ही लाखों कष्ट दूर हो जाते हैं और इसे धारण करने पर करोडों लाभ प्राप्त होते हैं तथा इसे पहनकर मंत्र जाप करने से यह और भी ज्यादा प्रभावशाली होता है.
रूद्राक्ष वर्णन | Description Of Rudraksha
जो रूद्राक्ष आंवले के आकार जितना बड़ा होता है वह रूद्राक्ष अच्छा होता है, जो रूद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. यह रूद्राक्ष माला के आकार के बारे में मेरा विचार है.
इसके बाद वह कहते हैं कि ब्राह्मण सफेद रूद्राक्ष है. लाल एक क्षत्रिय है. पीला एक वैश्य है और काले रंग का रूद्राक्ष एक शूद्र है.इसलिए, एक ब्राह्मण को सफेद रूद्राक्ष , एक क्षत्रिय को लाल, एक वैश्य को पीला और एक शूद्र को काला रूद्राक्ष धारण करना चाहिए.
उन रूद्राक्ष-मोती को उपयोग में लाना चाहिए जो सुन्दर, मजबूत, बड़ा, तथा कांटेदार हो और उन रूद्राक्ष को नहीं लेना चहिए जो कहीं से टूटा हो या उस पर कीडा लगा है या कांटे बिना हो उचित नहीं होता, जिस रूद्राक्ष में प्रकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें खुद छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रूद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रूद्राक्ष को गले में पहने तो तात्पुरषा मंत्र जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए यह कल्याणकारी होता है.
रूद्राक्ष के विभिन्न रूप | Various Forms Of Rudraksha
भुसुण्ड, फिर से 'कालाग्निरुद्र' से पूछते हैं कि रूद्राक्ष माला के रूप एवं प्रभाव क्या होते हैं आप मुझे इसके सभी रहस्यों का ज्ञान प्रदान करें. ‘कालाग्निरुद्र' उनसे कहते हैं एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्व का रूप होता है. दोमुखी रुद्राक्ष को अर्धनारीश्वर कहते हैं इसे धारण करने से शक्ति एवं शिव दोनो की प्राप्ति होती है, तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय है इससे अग्नि का आशीर्वाद प्राप्त होता है, चारमुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा का रूप है,
पंचमुखी रुद्राक्ष पांच मुख वाले शिव का रूप है जो हत्या जैसे पाप को भी नष्ट कर देता है छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय एवं गणेश का रूप है इसे धारण करके भक्त धन, स्वास्थ्य, बुद्धि व ज्ञान पाता है, सप्तमुखी रुद्राक्ष सात लोकों, सात मातृशक्ति का रूप है इसे पहनकर भक्त धन, स्वास्थ्य और मन की पवित्रता को पाता है, अष्टमुखी रुद्राक्ष आठ गुणों का, प्रकृति का रूप है इसे पहन के भक्त इन देवों की कृपा प्राप्त करता है, नौमुखी रुद्राक्ष नौ शक्तियों का रूप है इसे धारण करके भक्त को नौ शक्तियों का अनुग्रह उपलब्ध हो जाता है, दसमुखी रुद्राक्ष यम देवता का,
ग्यारहमुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्र का रूप माना गया है इसे धारण करके धन में वृद्धि की कृपा प्राप्त होती है, बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णु एवं बारह आदित्यों का प्रतीक माना गया है इसे उपयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, तेरहमुखी रुद्राक्ष कामदेव का रूप माना गया है इसे धारण करने से समस्त मानोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा चौदहमुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र भगवान के नेत्रों से हुई मानी जाती है इसे धारण करने से रोगों का नाश होता है.
रूद्राक्ष धारण के नियम | Rules For Wearing Rudraksha
रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए उसे मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का त्याग करना चाहिए कर देना चाहिए. रूद्राक्ष को पूर्णिमा जैसे शुभ दिनों में धारण करने पर व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. रूद्राक्ष का आधार ब्रह्मा जी हैं उसकी नाभि विष्णु हैं , उसके चेहरे रुद्र है और उसके छिद्र देवताओं के होते हैं.
एक बार संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं.
तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रूद्राक्ष कहा गया
इस रूद्राको छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोंडों गुना बढ़ जाता है.
रूद्राक्षजाबालो उपनिषदमहत्व । Rudraksha Jabala Upanishad Importance
रूद्राक्षजाबालो उपनिषद एक महत्वपूर्ण उपनिषद है जो रूद्राक्ष के महत्व को स्पष्ट करता है इस उपनिषद में रूद्राक्ष की पूर्ण विवेचना प्रस्तुत कि गई है जिसमें इसकी उत्पत्ति इसे गुण इसके शुभ लाभ तथा धारण करने के नियम आदि बातों को बहुत ही सरल प्रकार से व्यक्त किया गया है इस उपनिषद का श्रवण एवं मनन करने से समस्त शुभ फलों की प्राप्ति होती है इसे पढने वाला गुरू की उपाद्धी पाता है मंत्रों का शिक्षक बनता है इस उपनिषद का किसी भी समय पठन पाठन शुभ फल की प्राप्ति कराता है तथा व्यक्ति के कई जन्मों के पापों को नष्ट कर. उसे गायत्री जाप के छह लाख मंत्रों के समान फल प्राप्त होता है.
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद रूद्राक्ष से संबंधित उपनिषद है यह उपनिषद सामवेदीय शाखा के अंतर्गत आता है जिसमें भगवान शिव के 'रुद्राक्ष' की महत्ता को व्यक्त किया गया है. इस उपनिषद में रूद्राक्ष से संबंधित अनेक प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है जिसमें रूद्राक्ष की उत्पत्ति उसका आकार, उसे धारण करने का तरीका उससे प्राप्त फल होने वाले फलों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है. इस उपनिषद में भुसुण्ड और 'कालाग्निरुद्र' के मध्य होने वाले संवादों के द्वारा इसे कथा का रूप प्राप्त होता है. रुद्राक्ष उत्पत्ति
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद के प्रारंभ में भुसुण्ड, कालाग्निरूद्र से प्रश्न करते हैं कि कृपा कर आप मुझे रुद्राक्ष के विषय में बताएं यह क्या है व कहां से आया इसके क्या लाभ हैं इन सभी तथ्यों को आप मेरे समक्ष प्रस्तुत करें. इस पर प्रभु कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं रूद्राक्ष की उत्पत्ति मेरे द्वारा ही हुई है एक बार जब त्रिपुरासुर का वध करते हुए मेरे नेत्रों में से जल की कुछ बूंदे आँसू के रूप में पृथ्वी पर जा गिरी और वह बूंदे रुद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गईं जिस प्रकार रूद्राक्ष की उत्पत्ति हुई.
रूद्राक्ष नाम का उच्चारण मात्र ही सभी फलों को प्रदान करने वाला है इसके नाम को जपने से दान में दस गायों को देने जितना लाभ प्राप्त होता है. जब मैने अपनी आँखें एक हजा़र वर्षों तक बंद रखीं तब मेरी पलकों से, पानी की कुछ बूंदें नीचे गिरी तो वह रूद्राक्ष बनीं.
यह रूद्राक्ष भक्तों के समस्त पापों नष्ट कर देता है. इसे पहनकर सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. रूद्राक्ष को देखने भर से ही लाखों कष्ट दूर हो जाते हैं और इसे धारण करने पर करोडों लाभ प्राप्त होते हैं तथा इसे पहनकर मंत्र जाप करने से यह और भी ज्यादा प्रभावशाली होता है.
रूद्राक्ष वर्णन
जो रूद्राक्ष आंवले के आकार जितना बड़ा होता है वह रूद्राक्ष अच्छा होता है, जो रूद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. यह रूद्राक्ष माला के आकार के बारे में मेरा विचार है.
इसके बाद वह कहते हैं कि ब्राह्मण सफेद रूद्राक्ष है. लाल एक क्षत्रिय है. पीला एक वैश्य है और काले रंग का रूद्राक्ष एक शूद्र है.इसलिए, एक ब्राह्मण को सफेद रूद्राक्ष , एक क्षत्रिय को लाल, एक वैश्य को पीला और एक शूद्र को काला रूद्राक्ष धारण करना चाहिए.
उन रूद्राक्ष-मोती को उपयोग में लाना चाहिए जो सुन्दर, मजबूत, बड़ा, तथा कांटेदार हो और उन रूद्राक्ष को नहीं लेना चहिए जो कहीं से टूटा हो या उस पर कीडा लगा है या कांटे बिना हो उचित नहीं होता, जिस रूद्राक्ष में प्रकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें खुद छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रूद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रूद्राक्ष को गले में पहने तो तात्पुरषा मंत्र जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए यह कल्याणकारी होता है.
रूद्राक्ष के विभिन्न रूप
भुसुण्ड, फिर से 'कालाग्निरुद्र' से पूछते हैं कि रूद्राक्ष माला के रूप एवं प्रभाव क्या होते हैं आप मुझे इसके सभी रहस्यों का ज्ञान प्रदान करें. ‘कालाग्निरुद्र' उनसे कहते हैं एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्व का रूप होता है. दोमुखी रुद्राक्ष को अर्धनारीश्वर कहते हैं इसे धारण करने से शक्ति एवं शिव दोनो की प्राप्ति होती है, तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय है इससे अग्नि का आशीर्वाद प्राप्त होता है, चारमुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा का रूप है,
पंचमुखी रुद्राक्ष पांच मुख वाले शिव का रूप है जो हत्या जैसे पाप को भी नष्ट कर देता है छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय एवं गणेश का रूप है इसे धारण करके भक्त धन, स्वास्थ्य, बुद्धि व ज्ञान पाता है, सप्तमुखी रुद्राक्ष सात लोकों, सात मातृशक्ति का रूप है इसे पहनकर भक्त धन, स्वास्थ्य और मन की पवित्रता को पाता है, अष्टमुखी रुद्राक्ष आठ गुणों का, प्रकृति का रूप है इसे पहन के भक्त इन देवों की कृपा प्राप्त करता है, नौमुखी रुद्राक्ष नौ शक्तियों का रूप है इसे धारण करके भक्त को नौ शक्तियों का अनुग्रह उपलब्ध हो जाता है, दसमुखी रुद्राक्ष यम देवता का,
ग्यारहमुखी रुद्राक्ष एकादश रुद्र का रूप माना गया है इसे धारण करके धन में वृद्धि की कृपा प्राप्त होती है, बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णु एवं बारह आदित्यों का प्रतीक माना गया है इसे उपयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, तेरहमुखी रुद्राक्ष कामदेव का रूप माना गया है इसे धारण करने से समस्त मानोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा चौदहमुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र भगवान के नेत्रों से हुई मानी जाती है इसे धारण करने से रोगों का नाश होता है.
रूद्राक्ष धारण के नि यम
रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए उसे मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का त्याग करना चाहिए कर देना चाहिए. रूद्राक्ष को पूर्णिमा जैसे शुभ दिनों में धारण करने पर व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. रूद्राक्ष का आधार ब्रह्मा जी हैं उसकी नाभि विष्णु हैं , उसके चेहरे रुद्र है और उसके छिद्र देवताओं के होते हैं.
एक बार संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं.
तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रूद्राक्ष कहा गया
इस रूद्राको छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोंडों गुना बढ़ जाता है.
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद महत्व
रूद्राक्षजाबालोप� �िषद एक महत्वपूर्ण उपनिषद है जो रूद्राक्ष के महत्व को स्पष्ट करता है इस उपनिषद में रूद्राक्ष की पूर्ण विवेचना प्रस्तुत कि गई है जिसमें इसकी उत्पत्ति इसे गुण इसके शुभ लाभ तथा धारण करने के नियम आदि बातों को बहुत ही सरल प्रकार से व्यक्त किया गया है इस उपनिषद का श्रवण एवं मनन करने से समस्त शुभ फलों की प्राप्ति होती है इसे पढने वाला गुरू की उपाद्धी पाता है मंत्रों का शिक्षक बनता है इस उपनिषद का किसी भी समय पठन पाठन शुभ फल की प्राप्ति कराता है तथा व्यक्ति के कई जन्मों के पापों को नष्ट कर. उसे गायत्री जाप के छह लाख मंत्रों के समान फल प्राप्त होता है.
रुद्राक्ष को धारण करना या इसका उपयोग चिंता, कष्ट, दु:ख और पापों का अंत करने वाला माना गया है. शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष का असर और प्रभाव उसके रूप, रंग, आकार पर बहुत निर्धारित करता है. रुद्राक्ष चार रंग में प्राप्त होता है सफेद, लाल, पीला और काला. इसी प्रकार वर्ण के आधार पर भी रूद्राक्ष को विभाजित किया गया है. रुद्राक्ष का आकार उसके प्रभावों को सत्यापित करता है. आंवले के आकार जितना बड़ा रुद्राक्ष अच्छा होता है, जो रुद्राक्ष एक बदारी फल (भारतीय बेरी) के रूप में होता है वह मध्यम प्रकार का माना जाता है. जो रूद्राक्ष चने के जैसा छोटा होता है वह सबसे बुरा माना जाता है. जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से छिद्र बना होता है वह उत्तम होता है और जिसमें छेद किया जाए वह अच्छा नहीं होता, भगवान शिव के भक्त को रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए.
रुद्राक्ष के एक हजार मोती पहनना लाभदायक होता है. भक्त, जब सिर पर रूद्राक्ष को धारण करे तो उसे इष्ठ मंत्र जपना चाहिए , जब रुद्राक्ष को गले में पहने तो “तात्पुरषा मंत्र” जपना चाहिए और जब इसे वक्ष और हाथ पर धारण करें तो अघोर मंत्र को जपना चाहिए, यह कल्याणकारी होता है.
रुद्राक्ष जाबालोपनिषद में संतकुमार जी कालाग्निरूद्र से पूछते हैं कि "हे भगवान! मुझे रूद्राक्ष पहनने के लिए नियमों को बताएँ. और उसी समय निदाघ , दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिला, वशिष्ठ और पिप्प्लाद ऋषि वहां पहुंचते हैं और वह भी कालाग्निरूद्र से रूद्राक्ष को धारण करने के नियम को जानने की इच्छा प्रकट करते हैं. तब कालाग्निरूद्र उनसे कहते हैं कि, रुद्र की अक्षि (आँखें) से उत्पन्न होने के कारण इसे रुद्राक्ष कहा गया. इस रूद्राक्ष को छूने मात्र से ही कई पाप क्षय हो जाते हैं और इस रूद्राक्ष को धारण करने पर इसका फल करोड़ों गुना बढ़ जाता है.
रुद्राक्ष का आकार विभाजन | Classification of Rudraksha on the Basis of Size
रुद्राक्ष को उसके आकार के आधार पर तीन श्रेणीयों में बांटा गया है.
प्रथम श्रेणी का रुद्राक्ष | First class Rudraksha
प्रथम श्रेणी का रुद्राक्ष उत्तम रुद्राक्ष कहा जाता है. इस रुद्राक्ष का आकार आंवले के फल के आकार के समान होता है. अत: इस प्रकार का रुद्राक्ष उत्तम श्रेणी में आता है.
द्वितीय श्रेणी रुद्राक्ष | Second class Rudraksha
दूसरी श्रेणी में आता है मध्यम दर्जे का रुद्राक्ष. जो रुद्राक्ष आकार में बेर के समान दिखाई दे वह रुद्राक्ष मध्यम श्रेणी का रुद्राक्ष कहा जाता है.
तृतीय श्रेणी का रुद्राक्ष | Third Class Rudraksha
तीसरे स्थान में रखा गया रुद्राक्ष निम्न श्रेणी के रुद्राक्ष में गिना जाता है. इसे निम्न श्रेणी का रुद्राक्ष कहते हैं. इस रुद्राक्ष का आकार चने के बराबर होता है.
रुद्राक्ष के आकार का महत्व | Significance of size in selection of Rudraksha
सभी रुद्राक्ष ही पापों को नष्ट कर शिव कृपा देने वाले होते हैं किंतु यदि उन्हें नियमानुसार धारण किया जाए तो वह चमत्कारी प्रभाव छोड़ते हैं. सही आकार, ठोस, रुद्राक्ष पहनना चाहिए. सुख-शांति एवं अच्छे भाग्य के लिए बेर के आकार का रुद्राक्ष अनुकूल माना गया है. पापों तथा अनिष्ट को दूर करने के लिए आंवले के आकार का रुद्राक्ष अच्छा माना जाता है. टूटा हुआ ,कीड़े लगा रुद्राक्ष उपयोग में नहीं लाना चाहिए. रंग, रुप, आकार के आधार पर रुद्राक्ष को एक से इक्कीस मुखी रुद्राक्ष का महत्व बताया गया है जिन्हें धारण करने से विभिन्न फलों की प्राप्ति होती है.
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