CONFUSION, MYSTRY AND STRUGLE IS THE WAY OF NETAJI – मेजर सत्यगुप्त
तईपेई की विमान दुर्घटना में नेताजी को मृत न मानना यदि राजनीति है तो बिना किसी ठोस प्रमाण के उन्हें मृत घोषित कर देना भी राजनीती है |
१८ अगस्त १९४५ को न तो नेताजी ताइपेई गए थे, न ही उस दिन वहा कोई विमान दुर्घटना हुई थी | नेताजी १७ अगस्त १९४५ को साइगोन (वियतनाम ) में भूमिगत हो गए थे एवं कुछ समय बाद वे रूस पहुन्च गए थे | उपर्युक्त बातो पर प्रकाश डालने के पहले आइये, उन बातो से अवगत हो जाये जो नेताजी के जीवन में दुर्घटना के 7 साल के भीतर घटे थे |
फरवरी १९३८ – नेताजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने |
२९ दिसम्बर १९४० – जेल में नेताजी ने आमरण अनशन एवं शहीद होने की घोषणा कर दी तथा बंगाल के गवर्नर को पत्र लिखा – अन्याय एवं अनैतिकता से समझौता करके अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगना मेरे सिद्यांत के विरुद्य है | सिद्यान्तो को बेचकर अपने जीवन को खरीदने की अपेक्षा मैं जीवन को ठुकरा देना अच्छा समझता हूँ | शासन अपनी पाशविक के बल पर मुझे जेल में बंद करना चाहती है, इसके उत्तर में मेरा कहना है – या तो मुझे मुक्त करो अन्यथा मैं जीवित रहने से इंकार कर दूंगा | इससे अधिक संतोष की और क्या बात हो सकती है की कोई ब्यक्ति सिद्यान्तो के लिए जिया और सिद्यान्तो के लिए मरा |
५ जनवरी १९४० – जेल से रिहा | cont..d.k. shrivastava ९४३१०००४८६ १९.६.१०
जेल से रिहा होने के बाद इन्होने एकांतवास बंद कमरे में ले लिया | देशवासियों में हल्ला हुवा – सुभास चन्द्र बोस संत हो गए | किन्तु उन्हें क्या मालूम था कि बंद कमरे में आने वाले समय का कैसा ताना-बना बुना जा रहा था | इस एकांतवास में नेताजी ने अपना दाढ़ी खूब बढ़ा लिया |
१६ जनवरी १९४१ – रात के १:३० बजे मौलवी के वेश में घर से निकल गए और अपने एक साथी भगतराम के साथ ३१ जनवरी १९४१ को काबुल पहुंचे | इधर योजनानुसार २६ जनवरी १९४१ को परिजनों ने नेताजी को लापता घोषित कर दिया | उधर नेताजी एक जर्मन मंत्री पिल्गर के सहयोग से मास्को से होते हुवे वायुयान द्वारा ३ अप्रैल १९४१ को बर्लिन पहुंचे | बर्लिन में नेताजी ने जर्मन सर्कार की सहायता से ‘वर्किंग ग्रुप इंडिया’ की स्थापना की जो ‘ विशेष भारत विभाग’ में शीघ्र ही परिणत हो गया | जर्मनी में ही इन्होने ३७०० भारतीय युध्य्बंदियो को मिलाकर दिसम्बर १९४१ में ‘आज़ाद हिंद फौज’ की स्थापना की |
२२ मई १९४२ – नेताजी हिटलर से मिले | हिटलर ने अपने किताब ‘मैन्कैम्फ़’ में भारत पर कुछ आपत्तिजनक बातें लिखी थी | नेताजी ने निर्भीक स्वर में इसपर विरोध जताई तो हिटलर ने खेद प्रकट किया और अगले संस्करण में अपनी वर्णित भारतीय दृष्टीकोण को बदल देने का बचन दिया |
इधर भारत में ९ अगस्त १९४२ को ‘बम्बई कांग्रेस अधिवेशन’ में. गाँधी जी द्वारा ‘भारत छोडो आन्दोलन’ शुरू हूवा, इस आन्दोलन का नेहरु जी ने पूरजोर समर्थन किया | ध्यान देने वाली बात है कि ये वही नेहरु जी थे, जिन्होंने. १९४० में कहा था – ऐसे समय में, जबकि ब्रिटेन जीवन एवं मरण के संघर्ष में घिरा है, विश्व-युध्य छिड़ा है, आन्दोलन छेड़ना भारत के लिए अप्रतिष्ठाजनक होगा | उल्लेखनीय है कि, इस समय नेताजी नागरिक अवज्ञा आन्दोलन एवं भारत छोडो आन्दोलन चलाना चाहते थें, कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे, किन्तु नेहरु जी व् पिठ्ठू नेताओ के बिरोध के कारण नहीं चलाये तथा कांग्रेस से अलग हो गए एवं ‘फॉरवर्ड ब्लाक ‘ की स्थापना की
प्रचलित कहानी के अनुसार, 1950 के दशक में ‘दशनामी’ सम्प्रदाय के एक सन्यासी नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं। नीमशहर और बस्ती में वे अपना एकाकी जीवन बिताते हैं। उन्हें ‘भगवानजी’ के नाम से जाना जाता है।
बताया जाता है कि नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे। खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिन मिलने-जुलने वालों की तादाद बढ़ जाती थी। पहचान खुलने के भय से और कुछ अर्थाभाव के कारण 1983 में, 86 वर्ष की अवस्था में वे पुरानी जगह बदल देते हैं और फैजाबाद (अयोध्या) आ जाते हैं। (ध्यान रहे, नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था।)
1975 से ही उनके भक्त बने डॉ. आर.पी. मिश्रा ‘रामभवन’ में उनके लिए दो कमरे किराये पर लेते हैं। यहाँ भगवानजी एकान्त में रहते हैं, पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते हैं और रात के अन्धेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते हैं। यहाँ तक कि उनके मकान-मालिक गुरुबसन्त सिंह भी दो वर्षों में सामने से उनका चेहरा नहीं देख पाते हैं। उनकी देखभाल के लिए सरस्वती देवी अपने बेटे राजकुमार मिश्रा के साथ रहती हैं। भगवानजी इतने गोपनीय ढंग से रहते हैं कि उन्हें ‘गुमनामी बाबा’ का नाम मिल जाता है, जो गुमनाम ही रहना चाहता हो।
16 सितम्बर 1985 को गुमनामी बाबा का देहान्त होता है। 18 सितम्बर को उनके भक्तजन बाकायदे तिरंगे में लपेटकर उनका पार्थिव शरीर सरयू तट के गुप्तार घाट पर ले जाते हैं और तेरह लोगों की उपस्थिति में उनका अन्तिम संस्कार कर दिया जाता है। इसके बाद खबर जोर पकड़ती है कि है कि गुमनामी बाबा नेताजी थे।
गुमनामी बाबा के सामान को प्रशासन नीलाम करने जा रहा था। लालिता बोस, एम.ए. हलीम और विश्वबन्धु तिवारी कोर्ट गये, तब जाकर अदालत के आदेश पर मार्च’ 86 से सितम्बर’ 87 के बीच उनके सामान को 24 ट्रंकों में सील किया गया। 26 नवम्बर 2001 को इन ट्रंकों के सील मुखर्जी आयोग के सामने खोले जाते हैं और इनमें बन्द 2,600 से भी अधिक चीजों की जाँच की जाती है। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के अलावे इन चीजों में नामी-गिरामी लोगों- जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के “गुरूजी”, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल के पत्र, नेताजी से जुड़े समाचारों-लेखों के कतरन, रोलेक्स और ओमेगा की दो कलाई-घड़ियाँ (कहते हैं कि ऐसी ही घड़ियाँ वे पहनते थे), जर्मन दूरबीन, इंगलिश टाईपराइटर, पारिवारिक छायाचित्र, हाथी दाँत का स्मोकिंग पाईप (टूटा हुआ) इत्यादी हैं। यहाँ तक कि नेताजी के बड़े भाई सुरेश बोस को खोसला आयोग द्वारा भेजे गये सम्मन की मूल प्रति भी है।
श्री मनोज कुमार मुखर्जी चूँकि ‘न्यायाधीश’ (अवकाशप्राप्त) हैं, अतः ‘बिना पक्के सबूतों और गवाहों’ के वे अन्तिम निर्णय लेने में असमर्थ हैं। तीन कारणों से वे ‘गुमनामी बाबा’ को ‘नेताजी’ घोषित नहीं करते:
1. बाबा को करीब से जानने वाले लोग स्वर्गवासी हो चुके हैं, अतः वे गवाही के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते;
2. बाबा का कोई छायाचित्र उपलब्ध नहीं है, और
3. सरकारी फोरेंसिक लैब ने उनके ‘हस्तलेख’ और ‘दाँतों’ की डी.एन.ए. जाँच का रिपोर्ट ऋणात्मक दिया है।
(ये दाँत एक माचिस की डिबिया में रखे पाये गये थे। अच्छा होता, अगर जस्टिस मुखर्जी ने ये जाँच भारत के बाहर के फोरेंसिक लैबों में भी करवाये होते। भारतीय ‘सरकारी’ लैबों की रिपोर्टों को विश्वसनीय मानना जरा मुश्किल है |)
खैर, नेताजी के ज्यादातर भक्त आज ‘दशनामी सन्यासी’ उर्फ ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ को ही नेताजी मानते हैं। (अनुज धर के ‘मिशन नेताजी’ ने इसके लिए बाकायदे अभियान चला रखा है।) कारण हैं: उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं; उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि।
जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं, उन्हीं में से कुछ बातें उनके विरुद्ध भी जाती है, मिसाल के तौर पर: सन्यास लेकर जब नेताजी ने पिछले जीवन से नाता तोड़ लिया, तो फिर पुराने पारिवारिक छायाचित्रों के मोह से वे क्यों बँधे रहे? क्या सिंगापुर छोड़ने के समय से ही वे इन छायाचित्रों को साथ लिये घूम रहे थे?
अगर उनके सामान में उनके ही टाईपराईटर और बायनोकूलर पाये जाते हैं, तो यह ‘दाल में काला’- जैसा मामला है। सिंगापुर छोड़ते समय निस्सन्देह वे अपना टाईपराइटर और बायनोकूलर साथ नहीं ले गये होंगे, न ही (सन्यास धारण करने के बाद) सोवियत संघ से भारत आते समय इन्हें लेकर आये होंगे, फिर ये उनतक कैसे पहुँचे? सिंगापुर में उनके सामान को तो माउण्टबेटन की सेना ने जब्त कर सरकारी खजाने में पहुँचा दिया होगा। (एक कुर्सी शायद लालकिले में है।)
माना कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नेताजी पर छपने वाली खबरों की कतरनों को उनके भक्तजनों ने उनतक पहुँचाया होगा, मगर सरकारी खजाने से निकालकर मेड इन इंग्लैण्ड एम्पायर कोरोना टाईपराइटर और मेड इन जर्मनी 16 गुना 56 दूरबीन उनतक पहुँचाना उनके भक्तजनों के बस की बात नहीं है। तो फिर? क्या गुप्तचर विभाग के अधिकारियों ने उनके पास ये सामान पहुँचाये? तो क्या ‘गुमनामी बाबा’ को भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने खड़ा किया था? ताकि वास्तविक नेताजी की ओर लोगों का ध्यान न जाये? या फिर, जनता ‘ये असली हैं’ और ‘वे असली हैं’ को लेकर लड़ती रहे और सरकार चैन की साँस लेती रहे?
भारत सरकार शर्मनाक कार्य-2
चक्रवर्ती राज गोपालचारी, जो भारत बिभाजन को स्वीकारने वाले प्रथम कांग्रेसी नेता थे, को १९५४ में भारतरत्न दिया गया |
जवाहर लाल नेहरु, जिसने उन सारे समस्याओ के आग पर राख की ढेर चढ़ा दी ताकि समस्याए छिप जाये,
१. जिसने कश्मीर को समस्या बना दिया | पं. जवाहर लाल नेहरू को कश्मीर समस्या का जनक बताया गया है। कश्मीर में जब पाकिस्तानी सेना सर पर पैर रखकर भाग रही थी, उसी समय माउन्टबेटन ने युद्ध विराम करा दिया और 32000 वर्ग मील जमीन पाकिस्तान के कब्जे में चली गई। इसे नेहरू की अदूरदर्शिता ही कहा जाएगा।
२. जिनके लेडी माउंटबेटन (अन्तिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन की पत्नी एडविना) के साथ नजदीकी सम्बन्ध थे | एडविना की बेटी पामेला हिल्स ने भी इसे स्वीकार किया कि दोनों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों को नजदीक से देखा था। एडविना की मृत्यु के बाद उनके सूटकेस से मिले नेहरू के अनेको प्रेम–पत्रों ने इसकी पुष्टि की | इसी आधार पर पामेला ने ‘‘इण्डिया रिमेम्बर्ड : ए पर्सनल एकाउन्ट आफ द माउन्टबेटन ड्यूरिंग द ट्रांसफर आफ पावर’ नामक पुस्तक लिखी।
३. जिन्हें लार्ड माउन्टबेटन के प्रति नैसर्गिक श्रद्धा का जबाबदेह माना गया है | डा. राममनोहर लोहिया के शब्दों में नेहरू के पूर्वज मुगलों की खिदमत करते रहे और उसी मुस्तैदी से अंग्रेजों की भी खिदमत किया। अत: मुगल संस्कार नेहरू वंश के रक्त में है। वंशानुगत मुगल सेवा का संस्कार काफी प्रबल थे। अंग्रेजी भक्ति भी इस परिवार की बेजोड़ थी। गोरों के प्रति उनकी नैसर्गिक श्रद्धा,
लार्ड माउन्टबेटन आदि से उनके गहरे सम्बन्ध रहे। सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया आदि से नेहरू की कभी नहीं पटी। नेहरू की पद्मजा नायडू, लेडी माउंटबेटेन से खूब पटती थी। श्रीमती बच्चन की चाय उन्हें बहुत पसन्द थी, नर्गिस–सुरैया के वे प्रशंसक थे, वैजयन्ती माला को वे सेब अपने हाथों से खिलाते थे।
४. जिन्हें भारत का विभाजन का जबाबदेह माना जाता है |
५. जिन्हें चीन द्वारा भारत पर हमला का जबाबदेह माना जाता है | तिब्बत को चीन की झोली में डालने वाले तथा दलाईलामा को भारत में शरण देकर चीन को भारत का शत्रु बनाने वाले नेहरू ही थे। ‘हिन्दी–चीनी भाई–भाई’ का नारा लगता रहा और चीन ने आक्रमण कर दिया। शत्रु–मित्र की पहचान का प्राय: अभाव था नेहरु में |
६. जिन्हें मुस्लिम तुष्टीकरण का जबाबदेह माना जाता है |
७. जिन्हें भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन के समर्थन का जबाबदेह माना जाता है | ,
८. जिन्हें भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देने का जबाबदेह माना जाता है | भारत–दुनिया का अनोखा देश है। कोई भी प्राणवान राष्ट्र व्यक्ति या वंश पर नहीं रीझते। प्रबुद्ध जनता ने द्वितीय विश्व युद्ध के ब्रिटिश नायक चर्चिल को नया प्रधानमंत्री नहीं बनाया क्योंकि इससे तानाशाही की सम्भावना थी। महान स्टालिन और माओ की पूजा नहीं चल सकी। जॉन कैनेडी के भाइयों को राष्ट्रपति नहीं बनाया गया। इससे राष्ट्रों की महानता स्पष्ट होती है। भारत में वंशवाद खूब चलता है। मोतीलाल नेहरु – जवाहरलाल नेहरु – इंदिरा गाँधी – राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी – राहुल गाँधी इसके स्पष्ट प्रमाण हैं |
९. जिन्हें हिन्दी को भारत की राजभाषा बनने में देरी करना व अन्त में अनन्त काल के लिये स्थगन का जबाबदेह माना जाता है |
१०. जिन्हें गांधीवाद अर्थव्यवस्था की हत्या का जबाबदेह माना जाता है |
११. जिन्हें ग्रामीण भारत की अनदेखी का जबाबदेह माना जाता है |
१२. जिन्हें सुभाषचन्द्र बोस का ठीक से पता नहीं लगाने का जबाबदेह माना जाता है |
१३. जिन्हें भारतीय इतिहास लेखन में गैर-कांग्रेसी तत्वों की अवहेलना का जबाबदेह माना जाता है |
१४. जिन्हें वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रामप्रसाद मिश्र ने स्वतंत्र भारत का शोक कहा है।
१५. जिन्हें स्वतंत्र भारत को पाश्चात्य सभ्यता–संस्कृति का दास बनाने का जबाबदेह माना गया है |
१६. जिन्हें भाषा समस्या को उत्पन्न करने वाले में मुख्य रूप से जबाबदेह माना गया है |
१७. जिन्हें ‘बांटो और राज करो’ की नीति का घिनौना प्रयोग कर सफलता प्राप्त करने का जबाबदेह माना गया है |
१८. जिनके कार्यकाल में ईसाई मिशनरियों को खुली छूट मिली।
१९. जिनके बारे में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज-गोपालचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया
जाता” । यदि बहुमत का आदर किया गया होता तो सरदार पटेल भारत के प्रधानमंत्री होते, परन्तु गांधी, पटेल से घबराते थे। माउन्टबेटेन भी पटेल से चिढ़ते थे।
जवाहर लाल नेहरु को १९५५ में भारतरत्न दिया गया |
इंदिरा गाँधी
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१. जिसने शुद्ध राजनितिक फायदे के लिए 25 जून १९७५ को आपातकाल की घोषणा की जो अपने दमनकारी कार्यवाहियों के लिए कुख्यात है | 11 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज नारायण की याचिका को स्वीकार करके रायबरेली से इंदिरा जी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाया जिससे उनकी संसद की सदस्यता समाप्त हो जाती और उन्हें छः वर्ष के लिए राजनीति से अलग रहना पड़ता। प्रतिक्रियास्वरू
मुखर्जी आयोग ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और जाँच के पाँच प्रमुख बिन्दुओं पर 8 नवम्बर, 2005 को पेश अपनी रिपोर्ट में निम्नानुसार ठोस निष्कर्ष दिए:
(क) क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं?
मुखर्जी आयोग – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई है।
(ख) यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या उनकी मृत्यु जैसा कि कहा गया है हवाई दुर्घटना में हुई थी?
मुखर्जी आयोग – उनकी मृत्यु वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई, जैसा कि बताया जाता है।
(ग) क्या जापानी मंदिर में जो अस्थियाँ रखी हैं वे नेताजी की अस्थियाँ हैं?
मुखर्जी आयोग – जापानी मन्दिर में रखे अवशेष नेताजी के नहीं हैं।
(घ) क्या उनकी मृत्यु किसी अन्य स्थान पर किसी अन्य ढंग से हुई है और यदि हाँ तो कब और कैसे?
मुखर्जी आयोग – किसी निश्चित साक्ष्य के अभाव में कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया जा सकता।
(ङ) यदि वे जीवित हैं तो उनके पते-ठिकाने के संबंध में…
मुखर्जी आयोग – उत्तर (क) में पहले ही दिया जा चुका है।
लेकिन भारत सरकार संसद में प्रस्तुत अपनी कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) में मुखर्जी आयोग के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हुई कि नेताजी की मौत 18 अगस्त, 1945 को कथित वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई थी और जापान के रेन्कोजी मंदिर में रखी अस्थियाँ नेताजी की नहीं हैं। संसद में इस बारे में हुए वाद-विवाद के दौरान गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने सरकार की तरफ से यह सफाई दी कि इस मामले पर पूर्ववर्ती शाह नवाज खान जाँच समिति तथा जी. डी. खोसला आयोग के निष्कर्षों को सरकार अधिक विश्वसनीय मानती है।
जबकि इसके ठीक विपरीत 28 अगस्त, 1978 को लोक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन दो पूर्ववर्ती जाँचों के निष्कर्षों के संबंध में निम्न वक्तव्य दिया था: – 18 अगस्त 1945 को मंचूरिया की हवाई यात्रा के दौरान तैहोकु हवाई अड्डे पर हवाई दुर्घटना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की रिपोर्ट के बारे में दो बार जांच की गई है जिनमें से एक मेजर जनरल शाह नवाज खां की अध्यक्षता में एक समिति द्वारा की गई थी और दूसरी पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री जी.डी. खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जाँच समिति द्वारा की गई थी। पहली समिति ने बहुमत से और श्री खोसला ने उनकी मृत्यु संबंधी रिपोर्ट को सच माना था। उसके बाद से इन दो रिपोर्टों में पहुंचे निष्कर्षों की सच्चाई को लेकर उचित शंकाएँ प्रस्तुत की गई हैं तथा साक्षियों की गवाही में अनेक महत्वपूर्ण असंगतियाँ देखी गई हैं |
इस संबंध में 2 फरवरी, 2007 को कोलकाता उच्च न्यायालय ने मुखर्जी आयोग के मुख्य निष्कर्षों को खारिज करने वाली केन्द्र सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को रद्द किए जाने की मांग करते हुए दायर एक जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है।
यह प्रश्न विचारणीय है कि नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है? वर्ष 1997 में कोलकाता उच्च न्यायालय में इस मामले को अंतिम रूप से निपटाए जाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की तरफ से पेश वकील ने विगत वर्षों में सरकार के पास मौजूद गोपनीय सूचनाओं के आधार पर जो बातें अदालत को बताईं उसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अप्रैल 1998 में सरकार को इस मामले की जाँच के लिए एक नया आयोग गठित करने का आदेश दिया। अदालत के उस आदेश में सरकार के वकील के इस बयान का उल्लेख इस प्रकार किया गया है: –
“अत: अब जांच आयोग अधिनियम 1952 (1952 का 60) के खण्ड 3 के उपखंड (1) और (2) के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार एतद्द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एम.के. मुखर्जी सहित एक जांच आयोग का गठन करती है।”
इस अधिसूचना से साफ जाहिर है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के बारे में कोई असंदिग्ध जानकारी नहीं थी और इसीलिए उसका यह मत था कि आयोग का गठन किया जाना जरूरी था, जिसके लिए कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रभाशंकर मिश्रा ने आदेश दिया था। उक्त अधिसूचना में उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित नए आयोग को जाँच के लिए दिए गए प्रश्नों से भी यह साफ जाहिर होता है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के संबंध में कोई निश्चयात्मक सूचना नहीं थी। यदि उसके पास ऐसी ठोस सूचना रही होती तो उसने आयोग द्वारा जाँच किए जाने हेतु इस तरह के प्रश्न तैयार नहीं किए होते |सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय के अधिकारी आयोग द्वारा निर्दिष्ट आवश्यक दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के बजाय गृह सचिव द्वारा लिखित एक गोपनीय नोट लेकर आए, जिसमें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क) का राग अलापा गया था। इस नोट को देखकर सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी भड़क गए और उन्होंने टिप्पणी की:
The issue is far too important to be decided in an ad hoc manner at the level of a Home Secretary. I am not prepared to allow an omnibus recourse to section 8 (1) (a)….(यह मामला इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस पर गृह सचिव के स्तर पर तदर्थ तरीके से निर्णय नहीं लिया जा सकता। मैं धारा 8(1)(क) का हर जगह सहारा लिए जाने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं हूं….)
26 मार्च, 2007 को सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में मिशन नेताजी के शयन्तन दासगुप्ता की अपील पर सुनवाई के दौरान केन्द्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी ने कहा कि “नेताजी से जुड़े दस्तावेजों पर से गोपनीयता का परदा हटाना होगा।” उन्होंने कहा कि “भारतीयों को अपने राष्ट्रनायक के बारे में सभी सूचना हासिल करने का पूरा अधिकार है।” उन्होंने घोषणा की कि इस मामले में अगली सुनवाई केन्द्रीय सूचना आयोग की पूर्ण पीठ करेगी और गृह मंत्रालय के पास इस मामले में आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने का यह अंतिम अवसर होगा और मंत्रालय को इस बारे में पर्याप्त स्पष्टीकरण देना होगा कि उन दस्तावेजों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि “यदि सरकार का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं हुआ तो आयोग सभी संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने का आदेश देने के लिए बाध्य होगा।”
प्रत्येक भारतीय को हक़ है कि वे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़े तथ्यों को जानें।
यह हमारे सरकारों की विफलता है कि घटना के 60 साल बाद भी सच छिपा हुआ है। शायद नेता जी पूर्णरूपेण कांग्रेसी तो थे किन्तु गांधी-नेहरू के चमचे न थे। आखिर नेताजी से सम्बंधित खोसला आयोग एवं शाहनवाज आयोग की जाँच दस्तावेजो को सरकार सार्वजानिक क्यों नहीं करती ?
संदेह-2
भारत की स्वतंत्रता के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री श्री क्लीमेंट एटली तीन सप्ताह की सदभावना यात्रा पर भारत यात्रा करने सपत्निक १२ अक्टूबर १९५६ को शांताक्रुज हवाई अड्डे पर उतरे | इस भ्रमण के दौरान वे लखनऊ भी पधारे | तब उ.प. के मुख्यमंत्री डॉक्टर संपूर्णानंद थे | वार्ता के दौरान उन्होंने पूछ ही लिया नेताजी के बारे में | एटली का छोटा सा उत्तर – रूस में है, सुनते ही वे अधिक जानकारी हासिल करने के लिए व्याकुल हो उठे | एटली ने उन्हें निराश नहीं किया और बताया कि विश्वयुद्ध के अंतिम दौर में मै ब्रिटेन का प्रधानमंत्री था | बोस मित्र रास्त्रो के युद्ध अपराधी थे | जापानी नहीं चाहता था कि भारत के इस महान कर्मयोगी और क्रांति के पुजारी को एक कैदी के रूप में हमारे हवाले किया जाये | अतः सोवियत संघ के मार्शल जोसेफ स्टालिन को उन्हें रूस में दाखिल होने के लिए किसी प्रकार राजी कर लिया | (श्री धमेंद्र गौड़, अमर उजाला, दिनांक ४ अप्रैल १९८२) (श्री गौड़ १९५६ में गृह मंत्रालय के इंटेलिजेंसी ब्यूरो में असिस्टेंट स्पेशल इंटेलिजेंस अफसर थे तथा फारेनर एंड सिक्योरिटी ब्रांच लखनऊ में कार्यरत थे तथा एटली के सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हें ही सौपी गयी थी
पंडित नेहरु को भी पता था कि नेताजी सोवियत संघ पहुँच गए है | इस बात की पुष्टि ३१ दिसंबर १९७१ को खोसला आयोग के समक्ष श्री श्याम लाल जैन के दिए गए एक बयान से स्पष्ट होता है जो १९४५ में आजाद हिंद फौज के बचाव समिति के संयोयक श्री आसफ अली के स्टेनो थे | श्री जैन ने बताया कि २७ दिसम्बर १९४५ को पंडित नेहरु श्री आसफ अली के दरियागंज (नई दिल्ली) स्थित आवास पर आये तथा अपने अचकन से एक गोपनीय पत्र निकाला और मुझे उसकी चार प्रतिया टाईप करने को कहा | उस पत्र में प्रेषक का नाम अस्पष्ट था तथा इस प्रकार की सूचना थी – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस साईंगोन से विमान द्वारा रवाना हुवे | वे देरेवे (मंचूरिया) में अपराहन १:३० बजे आये | वहां उन्होंने चाय पी और केले खाए | वहां पास ही में एक मोटर जीप खड़ी थी | जिस विमान से नेताजी आये थे वह एक जापानी बमवर्षक विमान था | नेताजी के हाथ में अटैचीकेस था | जब नेताजी ने चाय पी ली तो वे जीप में बैठ गए | उसी जीप में चार अन्य ब्यक्ति भी बैठे जिसमे एक जनरल शिदैई भी थे | उसके बाद जीप रुसी सीमा में चली गयी और दो या तीन घंटे बाद हवाई अड्डे पर लौट आयी | जीप में जो व्यक्ति नेताजी को ले गया था उसने पायलट को सूचित किया कि उसने नेताजी को रुसी क्षेत्र में पहुंचा दिया है | इसके बाद विमान टोक्यो के लिए उड़ गया | (खोसला आयोग की बैठके, भाग ४, पृष्ठ १३०४) |
उसी समय देश के एक बड़े नेता ने मुझसे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री श्री क्लीमेंट एटली के लिए एक गोपनीय पत्र टाईप करवाया, जो इस प्रकार था –
प्रिय श्री एटली
मुझे विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष चन्द्र बोस को स्टालिन ने रूस मे प्रवेश करने की अनुमति दे दी है | यह रूसियो द्वारा विश्वासघात है | रूस इंग्लॅण्ड एवं अमेरिका का मित्र रहा है | उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था | कृपया इसे नोट कर ले और जो करवाई उचित समझे, करे |
आपका
……………………..
पंडित नेहरु को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि नेताजी रूस में है | यहाँ तक कि नेताजी ने नेहरु को पत्र भी लिखा था कि वे रूस में है और भारत आना चाहते है | (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, कलकत्ता १९६१, पृष्ठ १६५)
नेहरु द्वारा गठित शाहनवाज समिति ने ४ मई १९५६ को टोक्यो में संवाददाताओ के समक्ष यह स्वीकार किया था कि उनका उदेश्य नेताजी के मृत्यु के बारे में प्रमाण एकत्रित करना है | (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, पृष्ट ९९)
जो समिति नेताजी के मृत्यु का प्रमाण पत्र एकत्रित करना चाहती हो, वह नेताजी के जीवन की जाँच क्या कर पायेगी ?
खाक करेगी, विल्कुल नहीं कर पायेगी | शाहनवाज समिति की रिपोर्टे विल्कुल भ्रामक एवं लोलुप्तापूर्ण थी जो तत्कालीन सरकार को ध्यान में रखकर तैयार की गयी थी | इसी समिती के एक तीसरे सदस्य ने एक अलग रिपोर्ट तैयार की थी और निष्कर्ष दिया था कि सब गवाहियों, दस्तावेजो, चित्रों आदि को ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के बाद मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि नेताजी की मृत्यु नहीं हुई | (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, पृष्ठ ११७)
मृत्यु से सम्बंधित बयानों में विरोधाभाष
आइये, अब नेताजी के मृत्यु से सम्बंधित बयानों में विरोधाभाष को देखे –
ले. कर्नल नोनोगाकी ने शाहनवाज समिति को बताया था कि दुर्घटना के बाद उन्होंने कर्नल रहमान को नेताजी का स्वेटर उतारते देखा था जबकि कर्नल रहमान के अनुसार वे स्वेटर पहने हुए नहीं थे | (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, पृष्ठ १२२) |
खोसला आयोग के समक्ष डॉक्टर योशिमी की गवाही के अनुसार – अस्पताल में लाये जाते वक्त नेताजी विल्कुल नंगे थे (खोसला आयोग की बैठके, भाग ६, पृष्ठ २४५५-५८) जबकि अर्दली एम्. कोजुओ (जो नेताजी को स्ट्रेचर पर डालकर अस्पताल में अन्दर लाये थे ) का बयान शाहनवाज समिति के सामने था कि – मिस्टर बोस स्ट्रेचर पर लेटे हुवे थे तथा वायु सेना अधिकारी की वर्दी पहने थे | (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, पृष्ठ १३१)
आखिर गवाहों की गवाही में इतना विरोधाभाष क्यों?
अगर घटना सच होती तो सबकी नजरे वही देखती है जो घटित होता है | अगर घटना घटित ही न हो तो कल्पनाये भिन्न होगी ही | चाहे लाख झूठ को सच बनाया जाये लेकिन गलती हो ही जाती है क्योकि बनाना पड़ता है | बनाये जाने वाले घटनाओ में कोई न कोई खामी, कोई न कोई दोष रह ही जाता है |
संदेह-3
२० अगस्त १९४५ को जापानी कर्नल टाडा ने श्री एस. ए. अय्यर को नेताजी की मृत्यु की सूचना दी | श्री अय्यर ने आग्रह किया कि उन्हें तुरंत तइपेई पहुंचा दे | कर्नल टाडा उन्हें विमान से ले गए किन्तु तइपेई नहीं, वल्कि एक अन्य नगर ताईचू | अय्यर ने पूछा – क्या यह ताइहोकू है ? जबाब मिला- नहीं, ताइचू है | अय्यर चिल्लाये – ऐसा क्यों????? नहीं नहीं, वे मरे नहीं है, अवश्य जीवित है | यह मनगढ़ंत कहानी है | देखिये कर्नल मै साफ कहता हूँ………………. (एस. ए. अय्यर, अन्टू हिम ए विटनेस, पेज ८५-८६)
आखिर अय्यर को नेताजी का शव दिखाने तइपेई क्यों नहीं ले जाया गया ?
क्योकि वहां विमान दुर्घटना और नेताजी के शव के नाम पर कुछ था ही नहीं |
संदेह-4
सबसे पहले दो मुख्य सम्भावना:
1. क्या नेताजी सोवियत संघ से भारत नहीं लौटे ?
2. क्या नेताजी सोवियत संघ से भारत लौट आये ?
अगर नेताजी भारत नहीं लौटे, तो उनके साथ क्या हुआ?
1.क) क्या स्तालिन ने नेताजी की हत्या करवा दी?
1948 तक स्तालिन ने कोशिश की, कि नेताजी ससम्मान भारत लौट जायें मगर भारत सरकार ने नेताजी को स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर हो सकता है कि कुछ समय बाद स्तालिन ने नेताजी की हत्या करवा दी हो। स्तालिन ने बहुतों की हत्या करवाई है। उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। उन्हें जानने वाले उन्हें हिटलर से भी ज्यादा निर्दय और निष्ठुर बताते हैं।
1.ख) क्या नेताजी को ब्रिटेन को सौंप दिया गया?
इस विकल्प पर विचार करने के लिए हमें जरा पीछे चलना होगा। जर्मनी 1942 में लाल सेना के जेनरल वाल्शोव को युद्धबन्दी बनाता है। बाद में ये वाल्शोव जर्मनी में करीब दो लाख सैनिकों की एक सेना गठित करते हैं और लाल सेना के ही सैनिकों से सोवियत संघ में स्तालिन का तख्ता पलटने का आव्हान करते हैं। विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद ये वाल्शोव ब्रिटिश सेना के हाथ लगते हैं। 1948 में वाल्शोव को उनके आदमियों सहित सोवियत संघ प्रत्यर्पित कर दिया जाता है और स्तालिन वाल्शोव तथा उनके ज्यादातर लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं। क्या अपने दुश्मन वाल्शोव को पाने के लिए स्तालिन ने ब्रिटेन के साथ नेताजी का सौदा कर लिया?
1.ग) क्या बलूचिस्तान-ईरान सीमा पर नेताजी की हत्या की गयी?
लॉर्ड माउण्टबेटन और जनरल वावेल नेताजी को ‘मौके पर मार देने’ के हिमायती थें, बिना मुकदमा चलाये, बिना किसी प्रचार के। अतः अगर ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने स्तालिन से नेताजी को (वाल्शोव के बदले) हासिल कर लिया, तो क्या उन अधिकारियों ने चुपचाप नेताजी की हत्या कर दी? (‘मिशन नेताजी’ के अनुज धर द्वारा जुटायी गयी सामग्री के अनुसार- ऐसी खबरें हैं कि कुछ लोगों ने 1948 में क्वेटा में नेताजी को देखा था | ब्रिटिश सैन्य अधिकारी उन्हें बन्दी बनाकर कार में बलूचिस्तान-ईरान सीमा के ‘नो-मेन्स लैण्ड’ की ओर ले जा रहे थे।)
1.घ) क्या नेताजी साइबेरिया जेल में परिपक्व उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुए?
ऐसा भी हो सकता है कि नेताजी ने परिपक्व उम्र में साइबेरिया के यार्कुत्स्क शहर की जेल की एक कोठरी में अपनी अन्तिम साँस ली हो। (नेताजी का जन्म 1897 में हुआ था- परिपक्व उम्र का अनुमान आप लगा सकते हैं।)
एक तथ्य यह भी है जिसे उपर्युक्त विकल्पों के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता। यह तथ्य है- नेताजी ने ‘खाली हाथ’ सोवियत संघ में प्रवेश नहीं किया था, बल्कि उनके साथ ‘बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और सोने के आभूषण’ थे। (नेहरूजी को सन्देश भेजने वाले सूत्र के कथन को याद कीजिये- ‘…उनके साथ बड़ी मात्रा में सोने की छड़ें और गहने थे…’ ) ऐसे भी, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘आजाद हिन्द बैंक’ का सोना तीन-चार ट्रंकों में तो रखा ही होगा और उनमें से एक ट्रंक नेताजी के साथ ही सोवियत संघ तक गया होगा।
इस एक ट्रंक सोने के बदले में, अनुमान लगाया जा सकता है कि सोवियत संघ में न तो नेताजी की हत्या की गयी होगी, न उन्हें ब्रिटेन के हाथों सौंपा गया होगा और न ही उन्होंने अपना सारा जीवन साइबेरिया की जेल में बिताया होगा। उन्होंने भारत आना चाहा होगा और रूसियों को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अतः दूसरी सम्भावना यह है कि नेताजी भारत लौट आये।
मगर कब? क्या स्तालिन की ही अवधि में? इसकी सम्भावना कम नजर आती है। उन दिनों भारत और सोवियत संघ के बीच या नेहरूजी और स्तालिन के बीच सम्बन्ध इतने घनिष्ठ नहीं ही थे कि नेताजी और नेहरूजी के बीच किसी समझौते की गुंजाईश बने। (नेहरूजी के प्रधानमंत्री बनने पर स्तालिन ने कोई प्रसन्नता जाहिर नहीं की थी; न ही उन्होंने कभी विजयलक्ष्मी पण्डित को मिलने का समय दिया।) मार्च 1953 में स्तालिन की मृत्यु होती है और उनके द्वारा साइबेरिया की जेलों में बन्दी बनाये गये लोगों के ‘पुनर्वास’ का कार्यक्रम 1955 में शुरु होता है। जाहिर है, ‘नेताजी’ के भी ‘पुनर्वास’ का प्रश्न तब उठा होगा। ‘पुनर्वास’ के लिए नेताजी ने भारत आना चाहा होगा। उधर नेहरूजी (‘प्रत्यर्पण’ के कानूनी पचड़ों तथा ‘अराजकता’ फैलने के खतरों के कारण) नहीं चाहते कि नेताजी भारत आयें। ऐसे में, सोवियत राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव ने मध्यस्था की होगी। फैसला यही हुआ होगा कि नेताजी भारत में ही अपना जीवन गुजारेंगे, मगर ‘अप्रकट’ रहकर, जिससे कि उन्हें ब्रिटेन प्रत्यर्पित करने का मामला न उठे, और न ही देश में किसी प्रकार की ‘अराजकता’ की स्थिति पैदा हो। भले ब्रिटेन ने बीस वर्षों के लिए नेताजी को ‘राजद्रोही’ घोषित कर रखा हो, मगर नेहरूजी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए नेताजी ने ‘आजीवन’ ही अप्रकट रहने का ‘भीष्म’ वचन दे दिया होगा! मान लिया जाय कि सत्ता-हस्तांतरण के समय 20 वर्षों के अन्दर नेताजी के भारत आने पर उन्हें ब्रिटेन को प्रत्यर्पित करने का समझौता नहीं हुआ होगा, मगर ‘राजनीतिक अस्थिरता’ फैलने की आशंका से तो इन्कार नहीं ही किया जा सकता।
‘प्रत्यर्पण’ और ‘अराजकता’ के अलावे कुछ अन्य बातों पर भी ध्यान देने की जरूरत है | अगर नेताजी ‘प्रकट’ हो जाते हैं, तो –
1. कर्नल हबिबुर्रहमान सहित उनके दर्जनों सहयोगी और जापान देश दुनिया के सामने झूठा साबित हो जाता है।
2. उन्हें ब्रिटिश-अमेरीकी हाथों से बचाने के लिए किये गये सारे प्रयासों पर पानी फिर जाता है।
3. 21 अक्तूबर 1943 के दिन उन्होंने शपथ ली थी- “…मैं सुभाष चन्द्र बोस, अपने जीवन की आखिरी साँस तक आजादी की इस पवित्र लड़ाई को जारी रखूँगा… ।” …मगर वे ऐसा नहीं कर पाते और उन्हें लगता होगा कि अब अपने देशवासियों के बीच शान से जीने का उन्हें हक नहीं है।
खैर, ‘अप्रकट’ रहने के कारण चाहे जितने भी हों, मगर इतना है कि 1941 का “जियाउद्दीन”…, 1941 का ही “काउण्ट ऑरलैण्डो माजोत्ता”…, 1943 का “मस्तुदा”…, 1945 का “खिल्सायी मलंग”… अन्तिम बार के लिए एक और छद्म नाम और रूप धारण करता है… और सोवियत संघ से भारत में प्रवेश करता है !
अनसुलझे तथ्य
कुछ अनसुलझे तथ्य
1- ब्रिटिश पार्ल्यामेंट में मि. एटली (तत्कालीन प्रधानमंत्री) ने 18 अगस्त, 1945 में कहा था कि उनका भारतीय नेताओं से समझौता हो चुका है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के पकड़े जाने पर उन्हें ब्रिटिश सरकार के हवाले कर दिया जायेगा !
2- 1948 में मास्को में दार्शनिक सम्मेलन में भाग लेने गये (पूर्व राष्ट्रपति) भारत के प्रख्यात दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मुलाकात नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से हुई थी!
3- श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित की मुलाकात 1948 में रूस में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से हुई थी! उस समय वे भारत की विदेश मंत्री थी | शांताक्रूज हवाई अड्डे पर उन्होंने यह घोषणा की थी कि वह भारतवासियों के लिए एक अच्छी खबर लाई हैं परन्तु नेहरू जी के दबाव में आकर उन्होंने जीवनभर अपनी जबान नहीं खोली- !
4- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तिब्बत में एकनाथलाता के रूप में 1960 में रहे!
5- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस 1960 से 1970 तक शारदानन्द के रूप में प.बंगाल में शौलमारी आश्रम में रहे!
6- नेता जी 1964 में नेहरू जी की मत्यु के बाद उनके शव के साथ देखे गये थे!
7- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस 1971 में काँग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इन्दिरा जी के साथ देखे गये!
8- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस गुमनामी बाबा के रूप में फैजाबाद में 1985 तक रहे!
9- १३ मई,1962 को नेहरू जी ने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के बड़े बाई श्री सुरेशचन्द्र बोस को पत्र क्रमांक-704, पी.एम. / 62 में लिखा था कि हमारे पास नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का कोई प्रमाण नही है!
10- कस्बा पूरनपुर जनपद-पीलीभीत में 15 फरवरी 2009 को भारतीय सुभाष सेना के संस्थापक परम पूज्य महान संत सम्राट सुभाष जी द्वारा यह घोषणा की गई थी कि वे ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस हैं!
· सार: नेताजी को मृत घोषित क्यों किया गया ?
नेताजी के सन्दर्भ में सारी बाते अत्यंत संक्षेप में –
नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन कर अमेरिका एवं इंग्लैंड के बिरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, किन्तु १९४५ में जापान-जर्मनी के घुटने टेकने के उपरांत इनके सामने दो प्रश्न उठा – पहला या तो खुद भी घुटने टेक दे (जो कि नेताजी सरीखे व्यक्ति के लिए विल्कुल असंभव था), दूसरा – लड़ाई को जारी रखे | लड़ाई को जारी रखने के लिए पुनः सेना को संगठित करना पड़ता | इसके लिए मीटिंग हुई और तय हुआ कि नेताजी रूस चले जाये और वहां पुनः सेना का संगठन करे | नेताजी चल पड़े | चूँकि जापान-जर्मनी की हार हो गयी थी और अमेरिका-इंग्लैंड विजयी हुवे थे अतः इस हालत में नेताजी कही भी रहते, अमेरिका-इंग्लैंड युद्ध अपराधी के रूप में उन्हें बंदी बना लेते, जो की जापान नहीं चाहता था | जापान नहीं चाहता था कि भारत का यह कर्मवीर शेर जेल में रहे या किसी प्रकार का दंड भुगते | अतः यह निर्णय लिया गया कि नेताजी को मृत घोषित कर दिया जाये और गुप्त रूप से उन्हें रूस पहुंचा दिया जाये | इस बात के लिए स्टालिन को राजी कर लिया गया | विश्वयुद्ध में ब्रितानी-अमेरिका के साथ होते हुवे भी स्टालिन राजी हो गया क्योकि रूस शुरू से ही भारत का सच्चा मित्र रहा है | नेताजी रूस पहुँच गए | जब नेताजी सुरक्षित रूस पहुँच गए तब घोषणा की गयी जापान रेडिओ द्वारा की नेताजी विमान दुर्घटना में मर गए |
ईधर भारत की स्थिति में १९४५ के उपरांत तेजी से परिवर्तन हुआ | भारत की स्वतंत्रता स्पष्ट हो गयी | तब नेताजी ने नेहरु को पत्र लिखा कि वे रूस में है और भारत आना चाहते है (सुरेश चन्द्र बोस, डिसेंशिएंट रिपोर्ट, कलकत्ता १९६१, पृष्ठ १६५) | पंडित नेहरु ये अच्छी तरह से जानते थे कि भारतीय जनता में नेताजी उनसे कही अधिक ज्यादा लोकप्रिय है और यदि वे वापस आये तो सारे देश में इस महान देशभक्त का अभूतपूर्व स्वागत होगा | अतः कोई कसर न छोड़ी तथा इस बात का खूब हो हल्ला मचाया गया कि नेताजी निश्चित रूप से मर गए है | राजनितिक हत्या कर दी गयी नेताजी की | नेताजी सरीखे व्यक्ति को सिर्फ सत्ता हेतु यह लोलुपता अच्छी नही लगी और न ही सिर्फ सत्ता पाने हेतु देश का बंटवारा | गाँधी जी का ये बात – मेरी लाश पर ही देश का बंटवारा होगा – पूर्णतः ठीक लगा | किन्तु सत्ता लोभियों को ये समझ न आ सकी | नेताजी ने एकांतवास, गुप्तवास ले लिया | १९६० में नेताजी एक स्वामी शारदानंद के छद्म नाम से पश्चिम बंगाल के जिला कूच बिहार में एक आश्रम बना कर रहने लगे | वहां वे अपने अत्यंत विश्वसनीय व्यक्ति के सामने ही प्रकट होते थे | उनके विश्वस्त साथियो ने उनसे पूछा कि वे प्रकट क्यों नहीं होते है सबके सामने तो उन्होंने जबाब दिया – जब सारे देशवासियो का इन लोभी नेताओ पर से विश्वास उठ जायेगा, वही मेरे प्रकटीकरण का समय होगा | कुछ समय बाद नेताजी पुनः गायब हो गए | उसके बाद (१९६५ के बाद) उनका कुछ पता न चल सका |
नेताजी के लापता हो जाने की परिस्थितियों की मुखर्जी आयोग द्वारा छ: वर्षों तक की गई विस्तृत और गहन जाँच से यह तथ्य साफ उजागर हो गया है कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा घुटने टेक दिए जाने और उस पर अमेरिका और ब्रिटेन का नियंत्रण स्थापित हो जाने की आसन्न परिस्थितियों के मद्देनज़र नेताजी ने गोपनीय तरीके से सोवियत संघ चले जाने और वहाँ से भारत की आजादी का संग्राम जारी रखने की योजना बना ली थी। इस योजना को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए उनके द्वारा बनाई गई रणनीति के अनुरूप जापानी सेना में उनके विश्वस्त उच्च अधिकारियों ने सुनियोजित तरीके से तइपेई में 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो जाने की अफवाह फैला दी। इस अफवाह पर ना तो ब्रिटिश सरकार ने कभी भरोसा किया, न अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने और ना ही महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेताओं ने। लेकिन नेताजी के संबंध में सबसे पुख्ता जानकारी यदि किसी के पास हो सकती थी तो वह थी तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार, क्योंकि उपलब्ध तथ्य यही संकेत करते हैं कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 के बाद सोवियत संघ ही गए थे।
इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए दिल्ली स्थित ‘मिशन नेताजी’ नामक एक संगठन के प्रतिनिधि अनुज धर ने 2 अगस्त, 2006 को सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन दायर करके नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के लापता हो जाने के संबंध में विदेश मंत्रालय और तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान रूस के बीच अब तक हुए पत्राचार की सत्यापित प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराए जाने की मांग की। इसके उत्तर में लोक सूचना अधिकारी ने 25 अगस्त, 2006 को उत्तर दिया कि उक्त पत्राचार की प्रतिलिपियाँ उपलब्ध नहीं कराई जा सकतीं क्योंकि इसमें विदेशी राष्ट्र के साथ संबंध अंतर्ग्रस्त है और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) (क) से (च) के उपबंधों के अनुसार यह दी जा सकने वाली ‘सूचना’ के दायरे से बाहर है।
नेताजी का जन्म २३ जनवरी १८९७ को हुआ था | पता नहीं, आज नेताजी है भी या नहीं | दुष्टों ने इन्हें पूरी तरह मारने का खूब प्रपंच लगाया | शायद वे नहीं जानते थे कि वे सारे के सारे मर जायेंगे किन्तु नेताजी कभी नहीं मरेंगे | ये सारे दुष्टों को मरने के बाद भी अनंत काल तक हमारे हृदयों में रहेंगे | उन दुष्टों ने देश पर राज किया, नेताजी अनंतकाल तक हमारे दिलो में राज करेंगे | नेताजी आज कही भी हो, चाहे इस लोक में या उस लोक में; मेरे लिए वे हमेशा मेरे आँखों के सामने रहेंगे, हमेशा जीवित रहेंगे | मृत्यु उन जैसे व्यक्तिओ को छू भी नही सकती | , अमर हैं ये, नेताजी अमर हैं |
· 16-08-2011 05:02 PM #13
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Re: नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत - अनसुलझा रहस्य
धरती के मानचित्र पर भारत सबसे अधिक रहस्यमय देश हैं. भारत में ऐसे कई पात्र ऐसे हैं जो संसार के रंगमंच से कभी विदा ही नहीं हुए. इसमें रामायण और महाभारत काल के कुछ पात्र आज भी उपस्थित माने जाते हैं. नेताजी ऐसे ही चरित्र हो गये हैं. आजादी के रंगमंच का एक ऐसा नायक जो आता तो है लेकिन जिसके जाने का कोई प्रमाण नहीं मिल पाता है.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक। ऐसा महानायक जिसका कद महत्मा गांधी से भी ज्यादा उंचा था। पर गांधी के नेहरू प्रेम से देश की राजनीति की ऐसी धारा बही कि इस महानयक को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया। आजादी के छह दशक बाद भी सरकार इस महानायक के मौत के रहस्य से परदा उठाने में कभी गंभीर नहीं रही। समय-समय पर अनेक विवाद हुए। पर जांच आयोग से मामला ठंडे बस्ते में दम दोड़ चुका है। 23 जनवरी 2010 को नेताजी की 113वीं जयंती है। नेताजी की अब तक जिवीत रहने की संभावना बहुत कम बचती है। पर नेताजी के मौत या उनके गायब होने के रहस्य जानने के लिए लोगों में हमेशा उत्सुकता रही है।
एनडीए सरकार के कार्यकाल में गठित मुखर्जी आयोग ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, उसे यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल में खारिज कर दिया गया था। महानायक के मौत के रहस्य से परदा हमेशा कभी नहीं हटा। बार-बार यह बात उठी कि आखिर ताइवान में 18 अगस्त 1945 को कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ तो नेताजी अचनाक कहां गायब हो गये? कुछ वर्ष पूर्व यूपीए सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट यह कह कर खारिज कर दिया था कि उसमें कुछ भी नया नहीं है। जो बातें मुखर्जी आयोग ने कही हैं, वैसी बातें पहले भी होती रही है और उस पर काफी चर्चा हो रही है। लेकिन तब विवाद इस बात पर ज्यादा हुआ था कि मुखर्जी आयोग को अपनी जांच पूरी करने में सरकार की कई एजेसियों ने सकारात्मक रवैया नहीं अपना। यहां तक कि सरकार ने आयोग को रूस जाने तक की अनुमति नहीं दी गई थी।
सरकारी गलियारे में दबती है शोर
इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि देश की आजादी में अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले वीर योद्धा का अस्तित्व कहां खो गया यह आजाद भारत के छह दशक से भी ज्यादा समय में नहीं पता लगाया जा सका। किसी भी राष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी ऐतिहासिक धरोहर होती है। आने वाली पीढिय़ां इन्हीं के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए एक अपने देश के लिए सोचती हैं, कुछ करती हैं और किसी विशेष दिवस पर उनकी यादों को ताजा कर गौरवांवित होती है, एक ताकत पाती है। पर वर्तमान पीढ़ी बहुत प्रोफेसनल है। उस याद नेताजी के आदर्श से कुछ लेना नहीं है। उन्हें इतिहास तक सीमित रखना चाहती है। जिन्हें रुचि है, वे समय-समय पर नेताजी के मौत से परदा उठाने और उनके बिरासत को सहेजने की बात उठाते हैं। उनका शोर सरकारी गलियारे में दब जाता है।
खबर के लिए रिपोर्टर कानून तोड़ते हैं
मुखर्जी आयोग का कहना था कि उसके जांच में ताईवान के अलावा किसी देश से भी सहयोग नहीं मिला। 1946 में सुभाष चंद्र बोस जिंदा थे। उन्हें रूस में देखा गया था, लेकिन इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। लेकिन जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से अधिकृत जानकारी मिली थी कि १८ अगस्त १९४५ में ताईवान के ताईहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं था। लेकिन अमेरिका के एक अखबार शिकागों ट्रिब्यून के रिपोर्टर अल्फ्रेड बेक ने ताईहाकू हवाई अड्डे का पर दुर्घटना से संबंधित कुछ तस्वीर पेश कि थी। तब खोसला आयोग के सामने इस चित्र से संबंधित प्रमाणिकता साबित नहीं हो पाई थी। इस चित्र को प्रस्तुत करने वाले रिपोर्टर का खुद कहना था कि उस हवाई अड्डे पर चित्र खिंचना प्रतिबंधित था, तो फिर उसने कैसे ये फोटो ले लिये? पर यह कहकर रिपोर्टर की फोटो को खारीज नहीं किया जा सकता था। क्योंकि रिपोर्ट ऐसे की चुनौतीपूर्ण कार्यों को अंजाम देते हैं। इसके लिए चोरी-छिपे कानूनी नियमों के सामने आंख मुंद लेते हैं।
कहीं जापान का षडयंत्र तो नहीं?
विमान दुर्घटना प्रकरण में एक और बात गौर करने वाली यह है कि नेताजी की विमान दुर्घटना में हुई मौत का समाचार सबसे पहले जापानी रेडियों ने प्रसारित किया था। और उसके बाद कई ऐसे दलीले मिली जिससे नेताजी के जिंदा होने पर बल मिला। इससे यह भी लगता है कि जपान ने एक सुनियोजित योजना के तहत नेताजी को मृत घोषित किया, क्योंकि ब्रिटिश सेना को नेताजी की सरगर्मी से तलाश थी। हो सकता हो कि जपान के द्वितीय विश्व युद्ध में हार जाने बाद के ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें जापान में खोजने की कार्यवाही से बचना चाहता हो। इसलिए उसने रेडियों से उन्हें मरने की खबर प्रसारित कर दी हो।
गुप्त मिशन से कहीं मंचुरिया तो नहीं गये
पूर्व में गठित खोसला आयोग ने यह साबित किया था कि नेताजी शुरू से ही सोवियत संघ जाना चाहते थे और सोवियत संघ से ही भारत की आजादी का संघर्ष चलाना चाहते थे। लेकिन उनका सोवियत संघ से पहले जर्मनी पहुंचना जरूरी थी। क्योंकि उनको सहायता के लिए पहले ही जर्मनी से आश्वासन मिल चुका था। इतिहास के मुताबिक उन दिनों जर्मनी में भारत के हजारों सैनिक कैद थे। जर्मनी के शासकों ने नेताजी को आश्वासन दिया था कि वे इन भारतीय सैनिकों को कैद से रिहा कर देंगे जिनका उपयो नेताजी अपनी आजाद हिंद फैज में कर सकते थे। इसी सहायता से उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं का जमकर मुकाबला भी किया। लेकिन जब द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान हार के कगार पर पहुंचने लगे तो इसका सीधा प्रभाव आजाद हिंद फौज पर पड़ा। तब नेताजी ने एक गुप्त योजना के मुताबिक रूस की यात्रा पर जाने की तैयारी कर लिया। जिस विमान से वह सफर कर रहे थे व दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें नेताजी की मौत हो गई। लेकिन कई दस्तावेज अब भी खोसला आयोग पास है, जिसके मुताबिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इस गुप्त मिशन के चलते मंचूरियां तक पहुंच गए थे। बाद में मंचूरिया को रूसी सेनाओं ने जापान से छीन लिया और वहां के सैनिकों को उन्होंने बंदी बना लिया जिसमें नेताजी भी थे। फिर बंदी सैनिकों को रूस ले जाया गया, जहां उन खतरनाक जेलों में डाल दिया गया, जहां से कैदियों को सिर्फ मरने की खबर आती है। इसी प्रकरण में कहा जाता है कि नेताजी को स्टॉलिन ने फांसी दे दी थी।
पत्र लिखा, तो जवाब नहीं आया
नेताजी के एक भतीजे अभियनाथ बोस ने खोसला आयोग को यह बयान दिया था कि एक बार उन्हें एक ब्रिटिश राजनयिक ने फोन पर बताया कि १९४७ में नेताजी के साथ रूसी अधिकारियों ने बहुत ही बुरा बर्ताव किया था। उनके पिता यानी नेताजी के भई शरद चंद्र बोस ने १९४९ में अपने बेटे से कहा था कि उन्हें कुछ कूटनीतिक सूत्रों के जरिए पता चला है कि सोवियत संघ में नेताजी को साइबेरिया के यातना शिविर में रख गया था और १९४७ में स्टालिन ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया था। कहा जाता है कि नेताजी के बड़े भाई शरदचंद्र बोस ने इस संबंध में तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल को सूचित किया था और पेटल ने इस बात की सारी जानकारी प्राप्त करने के लिए मास्कों में तत्कालीन भारतीय राजदूत डॉ. राधाकृष्णनन को एक पत्र लिखा। डॉï राघाकृष्णन ने गृहमंत्री के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया।
निष्कर्ष पर नहीं पहुची कमेटी
मुखर्जी आयोग से पहले नेताजी की मृत्यु से रहस्य से पर्दा उठाने के लिए मुखर्जी आयोग से पहले शाहनवाज कमेटी और बाद में गठित खोसला आयोग कमेटी किसी भी निष्कर्ष में पर नहीं पहुंची। खोसला आयोग ने भी यह कह कर रहस्य को और गहरा दिया कि विमान दुर्घटना में नेताजी के मरने का भी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। किसी भी आयोग को आज तक ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं लगा जो यह साबित कर सके कि जिस विमान में नेताजी सफर कर रहे थे, उसमें उन्हें बैठते हुए देखा गया था।
नेता जी ने कहा था
आयोग का यह दावा को इससे भी पुष्ठिï होती है कि भारतीय राष्ट्रीय सेना के एक सिपाही निजामुद्दीन का यह कहना है कि जब नेताजी के मौत की खबर प्रसारित हुई, तब उसके बाद उन्होंने खुद नेताजी का वायरलेस संदेश ग्रहण किया था, जिसमें उन्होंने कहा था - मैं जिंदा हूं, वी विल कम टू इंडिया। लेकिन नेताजी की बेटी अनिता पैफ ने पिछले साल भारत यात्रा के दौरान साफ कहा था कि उन्हें यकीन है कि उनके पिता का निधन विमान हादसे में हो चुका है।
डीएनए टेस्ट का विचार बुरा नहीं विवाद इतना उलझ गया है कि हर पक्ष से विश्वसनीयता उठ चुकी है। जपान में रखी नेताजी की अस्थियों की असलियत पर संदेह उठने लगा है तो सरकार नेताजी की अस्थियों की डीएनए डेस्ट करार उसका मिलान उनकी बेटी से करने का विचार क्यों नहीं करती है? क्योंकि नेताजी की रहस्यमई मौते से पर्दा उठाने पर ही देश की आजादी के इतिहास से नेताजी और उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना के योगदान को और गौरव दिलाया जा सकता है।
... और यह खबर भी आई
23 जनवरी, 2010 को प्रकाशित खबर के मुताबिक थाईलैंड में रहने वाले त्रिलोक सिंह चावला आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दो पिस्तौलों को सहेजकर रखे हुए हैं। वह अपने जीते जी नेताजी की यह अमानत भारत सरकार को सौंपना चाहते हैं। नेताजी के सचिव रहे 89 वर्षीय त्रिलोक ने इस संबंध में बात करने के लिए अपने बेटे संतोष सिंह चावला को दिल्ली भेजा है। संतोष विगत दो हफ्तों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने की कोशिश में हैं, ताकि इन दोनों पिस्तौलों को सरकार को सौंपकर अपने पिता की अधूरी ख्वाहिश पूरी कर सकें। बैंकॉक से बातचीत में त्रिलोक ने कहा कि नेताजी चाहते थे कि आजादी के बाद मैं उन्हें ये दोनों पिस्तौलें लाल किले में लौटा दूं। मुझे इन हथियारों को सौंपने के आठ दिन बाद ही एक विमान हादसे में उनके निधन की खबर आई। मैं अभी भी नहीं मानता कि नेताजी हमारे बीच नहीं हैं और मैं आज तक उनकी राह देख रहा हूं। परंतु उम्र बढऩे के साथ अब चाहता हूं कि उनकी अमानत को अपने मुल्क को ही सौंप दिया जाए। भारत सरकार इन पिस्तौलों को स्वीकार करने में अनिच्छुक दिखती है और इसकी वजह भी नहीं पता। इन्हें वापस लेने के लिए भारत सरकार को थाईलैंड सरकार से सीधे संपर्क साधना चाहिए।
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