Wednesday, March 20, 2013
Tuesday, March 19, 2013
फैसले न लेने की कीमत
मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते,
लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने
लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का
समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने
जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी
को बनाया. प्रणब मुखर्जी, जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे, एक ऐसे जीओएम के भी
अध्यक्ष बन गए, जिसका काम था बाक़ी सारे जीओएम से काम कराना, क्योंकि मंत्री
जीओएम के लिए समय नहीं देते थे. मुझे नहीं पता कि ऐसे किसी भी जीओएम ने
कोई अनुशंसा की हो, जिसके अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी रहे हों, क्योंकि उनके पास
स्वयं जीओएम की बैठकों को किसी तार्किक अंत तक ले जाने का समय नहीं था.
प्रणब मुखर्जी के अपने मंत्रालय में कितने हल्के ढंग से विचार होता था और
जिसके ऊपर समय देना प्रणब मुखर्जी मुनासिब नहीं समझते थे, उसका एक उदाहरण
मुद्रास्फीति है. प्रणब मुखर्जी का मानना था कि इन्फ्लेशन इज़ ए सिस्टमेटिक
अप्रोच. इट्स ए बास्केट ऑफ गुड्स. उन्होंने कभी मुद्रास्फीति पर हमला
नहीं किया, व्यवस्था पर हमला किया. वित्त मंत्रालय यह समझ नहीं पाया कि
मुद्रा आपूर्ति ज़्यादा होने से मुद्रास्फीति बढ़ी है या फिर वस्तुओं की कमी
की वजह से. हक़ीक़त यह थी कि औद्योगिक विकास कम हो रहा था. भारत के अपने
औद्योगिक विकास की दर नीचे जा रही थी. आवश्यक वस्तुओं की कमी हो रही थी,
जिसकी वजह से मुद्रास्फीति बढ़ी. सरकार अपनी महान बुद्धिमानी से महंगाई कैसे
बढ़ाती है, इसका उदाहरण है आयरन ओर (लौह अयस्क) और स्टील. हमारा आयरन ओर
ज़्यादा से ज़्यादा चीन जा रहा था. सरकार ने तय किया कि उसे चीन नहीं भेजना
है तो उसके लिए उसने सीधा रास्ता न लेकर रेलवे के किराए में 300 प्रतिशत की
वृद्धि कर दी. इससे आयरन ओर चीन जाने से तो रुक गया, लेकिन सरकार ने यह
नहीं सोचा कि इसकी वजह से आयरन ओर हिंदुस्तान की फैक्ट्रियों में भी नहीं
जाएगा. इसका असर टाटा, राउरकेला आदि जगहों में स्थित हिंदुस्तान की सारी
स्टील फैक्ट्रियों पर पड़ा और इसकी वजह से आयरन ओर का काम करने वाले, खासकर
खनन में लगे लोगों की कमर टूट गई. अब हिंदुस्तान में स्टील बनना कम हो गया,
स्टील अब चीन से आ रहा है, जो महंगा है और हम वही महंगा स्टील खरीद रहे
हैं. हमने एक उद्योग को मारा. कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि सरकार प्याज़ भी
खा रही है और जूते भी. ठीक यही उदाहरण सीमेंट का है. 50 रुपये की बोरी 400
रुपये तक बिक गई. कारणों को वित्त मंत्रालय ने दूर नहीं किया.
वित्त मंत्रालय से जुड़ी हुई संस्थाएं, चाहे वह आरबीआई हो या दूसरी संस्थाएं, किसी के पास भी सही आंकड़ा नहीं है कि कुल काला धन कितना है. कोई 4 लाख करोड़ रुपये कह रहा है तो कोई 8 लाख करोड़ तो कोई 10 लाख करोड़ और आरबीआई इसे 30 लाख करोड़ बता रहा है. सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि वित्त मंत्रालय काले धन के ऊपर गंभीर नहीं है. वित्त मंत्रालय का सबसे मज़ेदार विरोधाभास नक़ली नोटों को लेकर है. वैसे तो एक कमाल यह हुआ कि नक़ली नोट हिंदुस्तान के रिजर्व बैंक की ट्रेजरी में पाए गए. उसकी सीबीआई जांच हुई, छापे पड़े, लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, कुछ पता नहीं. यह भी पता चला कि रिजर्व बैंक से नक़ली नोट बैंकों में भेजे गए. इसके ऊपर वित्त मंत्रालय ने कितना ध्यान दिया, हमें नहीं पता, लेकिन हमें इतना पता है कि वित्त मंत्रालय ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारी बातें विरोधाभासी लग सकती हैं, पर सच यही है. दूसरी चीज़ यह कि नक़ली नोट के बारे में पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने बयान दिया था कि हिंदुस्तान में जितनी करेंसी मौजूद है, उसमें हर तीसरा नोट नक़ली है. सरकार जब ऐसा बयान देती है तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा अर्थतंत्र, हमारा वित्त मंत्रालय कितना सजग है. उसने इसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया.
आपके सामने एक घटना रखते हैं. आपके सामने इम्तिहान पास करने के दो तरीक़े हैं. दोनों ही तरीक़ों से नंबर बराबर आते हैं. पहला तरीक़ा है कि आप रट्टा मारें और इतने ज़्यादा जवाब रट लें कि आपके सवाल का उत्तर सही हो और आपके 90 नंबर आ जाएं. दूसरा तरीक़ा है कि आपके पास ज्ञान इतना हो कि आपके पास जो सवाल आए, उसका समझ कर उत्तर दें. जवाब वही होगा और आपको भी 90 नंबर ही मिलेंगे. पर गाड़ी तब फंसती है, जब कहीं पर मुश्किल सवाल आ जाए. ऐसा सवाल, जिसका रट्टा नहीं मारा गया हो और तब ज्ञान वाला आदमी पास हो जाता है और रट्टे वाला रुक जाता है. अब तक हमारे देश में साधारण सवाल थे, साधारण समस्याएं थीं, तो हमारे आईएएस एवं मंत्रीगण रट्टा मारकर उनका हल निकालते रहे (चूंकि रट्टा मारकर पास हुए थे), लेकिन अब समस्या टेढ़ी हो गई और सवाल टेढ़ा हो गया, तो अब वे बग़लें झांक रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि वित्त मंत्री भी रट्टा मारकर पास हुए हैं, पर उनकी गतिविधियां यह बताती हैं या उनके तरीक़े यह बताते हैं कि वह भी रट्टा मारकर पास हुए, इसलिए इस समय लड़खड़ा रहे हैं. अजीब फैसले लेते हैं, सीआरआर कम करते हैं, मुद्रा प्रवाह बढ़ जाता है. ज़्यादा पैसे आ जाते हैं, महंगाई बढ़ जाती है. उसे संभालने के लिए एसएलआर कम करते हैं. ज्वैलरी पर एक प्रतिशत टैक्स लगा दिया. फैसला ऐसा किया कि उस एक प्रतिशत का असेसमेंट आपने इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया. सारे देश में आंदोलन हुआ. किसी को एक प्रतिशत टैक्स देने में ऐतराज़ नहीं था, लेकिन उसके असेसमेंट के लिए आपने जो इंस्पेक्टर लगा दिया, उस पर ऐतराज़ था.
उसी तरह से लोकसभा में पहली बार, शायद विश्व में पहली बार एक शब्द आया, सेंस ऑफ हाउस. जब अन्ना हजारे के अनशन के समय लोकसभा बुलाई गई तो दादा ने सेंस ऑफ हाउस की रणनीति बनाई और कहा कि लोकपाल बिल पास करेंगे. सदन की उस महत्वपूर्ण बैठक को मुख्यतय: प्रणब मुखर्जी ने ही संभाला. पहली बार या तो सरकार ने लोकसभा की बात यानी सेंस ऑफ हाउस को नहीं माना या लोकसभा ने देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की, अपने ही सेंस को एक्शन में ट्रांसलेट नहीं किया. अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है. लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि वित्त मंत्रालय से प्रणब मुखर्जी को मुक्ति मिल गई. अब प्रणब मुखर्जी देश की तंदुरुस्ती के ऊपर नज़र रखेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके जाते ही यह बयान दिया कि आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए एनिमल स्पिरिट की ज़रूरत है. इस बयान का भाष्य अभी तक प्रधानमंत्री की तऱफ से नहीं आया है. हम उस भाष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
वित्त मंत्रालय से जुड़ी हुई संस्थाएं, चाहे वह आरबीआई हो या दूसरी संस्थाएं, किसी के पास भी सही आंकड़ा नहीं है कि कुल काला धन कितना है. कोई 4 लाख करोड़ रुपये कह रहा है तो कोई 8 लाख करोड़ तो कोई 10 लाख करोड़ और आरबीआई इसे 30 लाख करोड़ बता रहा है. सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि वित्त मंत्रालय काले धन के ऊपर गंभीर नहीं है. वित्त मंत्रालय का सबसे मज़ेदार विरोधाभास नक़ली नोटों को लेकर है. वैसे तो एक कमाल यह हुआ कि नक़ली नोट हिंदुस्तान के रिजर्व बैंक की ट्रेजरी में पाए गए. उसकी सीबीआई जांच हुई, छापे पड़े, लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, कुछ पता नहीं. यह भी पता चला कि रिजर्व बैंक से नक़ली नोट बैंकों में भेजे गए. इसके ऊपर वित्त मंत्रालय ने कितना ध्यान दिया, हमें नहीं पता, लेकिन हमें इतना पता है कि वित्त मंत्रालय ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारी बातें विरोधाभासी लग सकती हैं, पर सच यही है. दूसरी चीज़ यह कि नक़ली नोट के बारे में पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने बयान दिया था कि हिंदुस्तान में जितनी करेंसी मौजूद है, उसमें हर तीसरा नोट नक़ली है. सरकार जब ऐसा बयान देती है तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा अर्थतंत्र, हमारा वित्त मंत्रालय कितना सजग है. उसने इसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया.
आपके सामने एक घटना रखते हैं. आपके सामने इम्तिहान पास करने के दो तरीक़े हैं. दोनों ही तरीक़ों से नंबर बराबर आते हैं. पहला तरीक़ा है कि आप रट्टा मारें और इतने ज़्यादा जवाब रट लें कि आपके सवाल का उत्तर सही हो और आपके 90 नंबर आ जाएं. दूसरा तरीक़ा है कि आपके पास ज्ञान इतना हो कि आपके पास जो सवाल आए, उसका समझ कर उत्तर दें. जवाब वही होगा और आपको भी 90 नंबर ही मिलेंगे. पर गाड़ी तब फंसती है, जब कहीं पर मुश्किल सवाल आ जाए. ऐसा सवाल, जिसका रट्टा नहीं मारा गया हो और तब ज्ञान वाला आदमी पास हो जाता है और रट्टे वाला रुक जाता है. अब तक हमारे देश में साधारण सवाल थे, साधारण समस्याएं थीं, तो हमारे आईएएस एवं मंत्रीगण रट्टा मारकर उनका हल निकालते रहे (चूंकि रट्टा मारकर पास हुए थे), लेकिन अब समस्या टेढ़ी हो गई और सवाल टेढ़ा हो गया, तो अब वे बग़लें झांक रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि वित्त मंत्री भी रट्टा मारकर पास हुए हैं, पर उनकी गतिविधियां यह बताती हैं या उनके तरीक़े यह बताते हैं कि वह भी रट्टा मारकर पास हुए, इसलिए इस समय लड़खड़ा रहे हैं. अजीब फैसले लेते हैं, सीआरआर कम करते हैं, मुद्रा प्रवाह बढ़ जाता है. ज़्यादा पैसे आ जाते हैं, महंगाई बढ़ जाती है. उसे संभालने के लिए एसएलआर कम करते हैं. ज्वैलरी पर एक प्रतिशत टैक्स लगा दिया. फैसला ऐसा किया कि उस एक प्रतिशत का असेसमेंट आपने इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया. सारे देश में आंदोलन हुआ. किसी को एक प्रतिशत टैक्स देने में ऐतराज़ नहीं था, लेकिन उसके असेसमेंट के लिए आपने जो इंस्पेक्टर लगा दिया, उस पर ऐतराज़ था.
उसी तरह से लोकसभा में पहली बार, शायद विश्व में पहली बार एक शब्द आया, सेंस ऑफ हाउस. जब अन्ना हजारे के अनशन के समय लोकसभा बुलाई गई तो दादा ने सेंस ऑफ हाउस की रणनीति बनाई और कहा कि लोकपाल बिल पास करेंगे. सदन की उस महत्वपूर्ण बैठक को मुख्यतय: प्रणब मुखर्जी ने ही संभाला. पहली बार या तो सरकार ने लोकसभा की बात यानी सेंस ऑफ हाउस को नहीं माना या लोकसभा ने देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की, अपने ही सेंस को एक्शन में ट्रांसलेट नहीं किया. अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है. लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि वित्त मंत्रालय से प्रणब मुखर्जी को मुक्ति मिल गई. अब प्रणब मुखर्जी देश की तंदुरुस्ती के ऊपर नज़र रखेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके जाते ही यह बयान दिया कि आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए एनिमल स्पिरिट की ज़रूरत है. इस बयान का भाष्य अभी तक प्रधानमंत्री की तऱफ से नहीं आया है. हम उस भाष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
Origin and meaning of āshrams
The word 'āshram' (आश्रम) has been derived from the root 'shram'
(श्रम्) which means to make efforts. The meaning of the derived word 'āshram' is, a state in which one makes efforts on one's own.
The four stages are:
The absolute means to accomplish the ultimate objective of human life, which is the Final Liberation or eternal benefaction, is the stage of the renunciant and to accomplish the spiritual practice of that stage the first three stages are essential. Thus the four stages are inter-related. In short, the system of 'stages of life,' teaches a materialist what spiritual practice he should undertake to gradually adopt the path of Spirituality (nivruttimarg) as his age advances.
2. Objectives and types
Righteousness (dharma), wealth (artha), desire (kāma) and the Final Liberation (moksha) [धर्मार्थकाममोक्ष] are the four pursuits (purushārtha) of human life according to the Bhaartiya (Indian) culture. The system of 'stages of life' (āshrams) explained in the Vedic religion is the principal means of attaining them. When explaining the duties to be performed in the various stages of life, the lifespan of man has been considered as 100 years and has been divided into four parts. Each part is called a stage (āshram).The four stages are:
-
Celibate (Brahmacharya): In the stage of
celibacy one has to live in the Guru's hermitage, study the scriptures
and undertake vowed religious observances (vrat).
-
Householder (Gruhasthāshram): In the stage
of a householder; through procreation, performing fire sacrifices and
study of scriptures one repays the three debts towards society,
ancestors and God respectively.
-
Retired householder (Vanaprasthāshram) and Renunciant (Sannyaas): As
one ages one has to retire to the forest to complete the third stage of
a retired householder. This is beneficial in gradually detaching
oneself from desire and attachment for wealth. Lastly, towards the end
of life one should renounce the world and attain the Final Liberation (moksha) through Self-realisation and thus accomplish the very purpose of life according to this philosophy.
The absolute means to accomplish the ultimate objective of human life, which is the Final Liberation or eternal benefaction, is the stage of the renunciant and to accomplish the spiritual practice of that stage the first three stages are essential. Thus the four stages are inter-related. In short, the system of 'stages of life,' teaches a materialist what spiritual practice he should undertake to gradually adopt the path of Spirituality (nivruttimarg) as his age advances.
3. Importance
The 'stages of life' are absolutely essential to decrease attachment for the Great Illusion (Māyā), to reduce awareness of the body (dēha-buddhī) and to consider others as a part of one's family and to assuage the ego.Guru Principle
A. गु शब्दस्तु अंधकारः स्यात् रु शब्दस्तन्निरोधकः ।
अंधकारनिरोधत्वात् गुरु इति अभिधीयते ॥
Meaning : ‘Gu (गु)’ refers to darkness assuming the form of ignorance and ‘ru (रु)’ to the radiance in the form of spiritual knowledge, which dispels this darkness. Thus the Guru is the one who dispels the darkness of ignorance.
B. Shrī Gurugita describes several origins of the word Guru.
C. In the Agamsar, a Holy text the meaning of the three alphabets in the word Guru are as given below.
A. The Guru is the one who dispels a disciple’s ignorance, advises him to undertake spiritual practice in order to make spiritual progress, gets it done from him and bestows spiritual experiences upon him. The Guru’s attention is fixed only on a disciple’s spiritual progress and not on his worldly happiness (as that depends on destiny).
C. The Guru is the one who is not small, yet transforms the small one into a large one (a Guru).
In this context H. H. Mounibaba of Narayangaon says, “Some great Saints visit places and preach to devotees and thus serve God Himself. It shows their broad vision. In comparison I am rather narrow-minded. I do not visit places and guide others. There is definitely a difference between those who swim in the ocean and those who dwell in a well. In short, this depicts my selfish nature.”
D. ‘God and a devotee are not distinct from each other, only God being unmanifest is unable to speak to a devotee who has awareness of his body hence He introduces the devotee to one of His representatives who is carrying out His mission. Such a representative performing His mission is called a Guru. In other words, He Himself speaks using the Guru as a medium.’ - H. H. Kane Maharaj, Narayangaon
Those who developed a dislike and lost faith in the rituals according to the Vēdas (Shroutkarmas) were the Aranyakas. In this class, study about spirituality began and the subject began to be preached thus giving rise to the Guru hierarchy. The names of Janak and Yadnyavalkya figure prominently among these Gurus.
When this system of teaching by recitation lapsed, the spiritual literature consisting of Vedangas and Darshans were maintained by the section of society known as the Shastris, whereas the tradition of learning Vēdas through recitation remained only with the Shroutis and Vedapathaks.’
‘In the Nath sect the Guru is accorded a higher status than God Himself. The yogis of this sect consider Deity Shiv as the foremost Guru and Matsyendra, a form of Shrīvishṇu, as His first disciple. In this sect there is a custom of describing the Guru lineage instead of the paternal lineage (Dnyaneshvari 18.1758). Dnyaneshvar never describes Himself as "the son of Viththalpant” but as "the disciple of Nivrutti”, repeatedly.’
अंधकारनिरोधत्वात् गुरु इति अभिधीयते ॥
Meaning : ‘Gu (गु)’ refers to darkness assuming the form of ignorance and ‘ru (रु)’ to the radiance in the form of spiritual knowledge, which dispels this darkness. Thus the Guru is the one who dispels the darkness of ignorance.
B. Shrī Gurugita describes several origins of the word Guru.
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ॥
Meaning : The letter ‘gu (गु)’ in the word ‘Guru (गुरु)’ refers to darkness (ignorance) while the letter ‘ru (रु)’ refers to light (spiritual knowledge). Thus undoubtedly, the Guru is Brahman who alleviates this ignorance. - 23अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ॥
C. In the Agamsar, a Holy text the meaning of the three alphabets in the word Guru are as given below.
गकारः सिध्दिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य हारकः ।
उकारो विष्णुरव्यक्टस्ञितयात्मा गुरुः परः ॥
Meaning : The ‘g (ग)’ in the word ‘Guru (गुरु)’ bestows supernatural powers (siddhis), the ‘r (र)’ emancipates from sins and the ‘u (उ)’ is the unmanifest Shrīvishṇu. In other words, the Guru is supreme, the embodiment of these three.उकारो विष्णुरव्यक्टस्ञितयात्मा गुरुः परः ॥
2. Definition and Meaning
Some definitions and meanings of the word Guru are given below.A. The Guru is the one who dispels a disciple’s ignorance, advises him to undertake spiritual practice in order to make spiritual progress, gets it done from him and bestows spiritual experiences upon him. The Guru’s attention is fixed only on a disciple’s spiritual progress and not on his worldly happiness (as that depends on destiny).
B. पिंडं पदं तथा रूपं रूपातीतं चतुष्टयम् ।
यो वा सम्यग् विजानाति स गुरुः परिकीर्तितः ॥ - नवचक्रेश्वरंत्र
Meaning : The one who knows the subtle body (pinḍa), the all
pervading nature, the form and that which is beyond the form equally
well, is a real Guru. Here the subtle body refers to the embodied soul
and the all pervading nature to Shiv (Brahman). Form refers to the manifest and that beyond the form to the unmanifest. - Navachakreshvar TantraC. The Guru is the one who is not small, yet transforms the small one into a large one (a Guru).
In this context H. H. Mounibaba of Narayangaon says, “Some great Saints visit places and preach to devotees and thus serve God Himself. It shows their broad vision. In comparison I am rather narrow-minded. I do not visit places and guide others. There is definitely a difference between those who swim in the ocean and those who dwell in a well. In short, this depicts my selfish nature.”
D. ‘God and a devotee are not distinct from each other, only God being unmanifest is unable to speak to a devotee who has awareness of his body hence He introduces the devotee to one of His representatives who is carrying out His mission. Such a representative performing His mission is called a Guru. In other words, He Himself speaks using the Guru as a medium.’ - H. H. Kane Maharaj, Narayangaon
3. History
‘During the period of compilation of mantrās, in order to arrange the Holy texts or verses systematically in the form of Sanhitas, the formation of the institution of the Guru to study, teach, practice and apply the mantrās became the need of the hour. Gradually the rituals of sacrificial fires (yadnyakarma) started becoming elaborate and complicated and it became necessary to undertake a special in-depth study to acquire mastery over that subject. As a result, batches of disciples began to gather around teachers well-versed in it. The names of many such teachers of the Sanhita period are available even today. Angiras, Garga, Atri, Bruhaspati, Vasishtha were the main teachers of those times.Those who developed a dislike and lost faith in the rituals according to the Vēdas (Shroutkarmas) were the Aranyakas. In this class, study about spirituality began and the subject began to be preached thus giving rise to the Guru hierarchy. The names of Janak and Yadnyavalkya figure prominently among these Gurus.
When this system of teaching by recitation lapsed, the spiritual literature consisting of Vedangas and Darshans were maintained by the section of society known as the Shastris, whereas the tradition of learning Vēdas through recitation remained only with the Shroutis and Vedapathaks.’
‘In the Nath sect the Guru is accorded a higher status than God Himself. The yogis of this sect consider Deity Shiv as the foremost Guru and Matsyendra, a form of Shrīvishṇu, as His first disciple. In this sect there is a custom of describing the Guru lineage instead of the paternal lineage (Dnyaneshvari 18.1758). Dnyaneshvar never describes Himself as "the son of Viththalpant” but as "the disciple of Nivrutti”, repeatedly.’
Tuesday, February 26, 2013
railway
हर मिनट दो की बजाय 7200 हजार ई टिकट बनेंगे
कुछ गाडियों में मुक्त वाईफाई की सुविधा दी जाएगा: रेलमंत्री
आरपीएफ में महिला जवानों की संख्या बढ़ाई जाएगी: बंसल
'जब लोग सफर करते हैं तो रेल का इंजन कहता है,'मैं खींच सकता हूं. मैं कर सकता हूं।'
पिछले वित्तीय वर्ष में रेलवे को 24600 करोड़ रुपये का नुकसान
12 वीं पंचवर्षीय योजना के पहले वर्ष में 10 हजार करोड़ रुपये जुटाए
रेलवे महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देगी
आरपीएफ की 4 कंपनियां इसी दृष्टि से बनाई गई है
नई भर्तियां भी होंगी, जिनमें 10 फीसदी महिलाओं को शामिल किया जाएगा।'
'राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों की तर्ज पर आधुनिक यात्री सुविधाओं से युक्त डिब्बे
चुनिंदा गाड़ियों में लगाए जाएंगे ये डिब्बे इन्हें अनुभूति नाम दिया गया
डिब्बों में बायो टायलेट लगाए जाएंगे
रेल नीर के 6 नए बॉटलिंग प्लांट लगाए जाएंगे
मुफ्त वाई-फाई की सुविधा भी कई ट्रेनों में दी जाएगी
इंटरनेट पर रेलवे रिजर्वेशन बुकिंग रात 12.30 से अगली रात 11.30 तक खुलने तक
मोबाइल से ई टिकट का भी प्रस्ताव भी
दिल्ली, बिलासपुर, पटना, जयपुर, आगरा, नागपुर, विशाखपट्टनम, बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर लाउंज सुविधा
वैष्णो देवी में दर्शन के लिए यात्री पर्ची ट्रेन के भीतर
आजादी एक्सप्रेस नाम से नई ट्रेन चलाई जाएगी
लोगों को उन स्थानों पर ले जाएगी जो देश की आजादी के लिहाज से अहम है
ये सस्ती और शैक्षणिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाली ट्रेन होगी
आजादी एक्सप्रेस नाम से पर्यटक व शैक्षणिक ट्रेन चलेगी
आधार योजना का रेलवे भी करेगा इस्तेमाल
'रायबरेली, प्रतापगढ़, सोनीपत, कालाहांडी, भीलवाड़ा, कुरनूल, पालाकार्ड में रेल आधारित नए उद्योग
रेलवे कैटरिंग में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रस्ताव
रेल भूमि विकास प्राधिकरण के लिए 1000 करोड़ का लक्ष्य
/जय श्री राम
लो जी ---- अब 180 रुपये वाला टिकेट ..भले ही ..फ्यूल सरचार्ज की वजह से आपको 190 का या 192 का पड़े
मतलब 180 की जगह ---190 रुपये ..10 रुपये ज्यादा
"फिर भी बंसल साब का कहना है --यात्री किराये में हमने कोई बढोतरी नहीं की"
गणित आती है देश के लोगो को ....अब 180 वाला 190 का हो गया है ...काटजू के 90% समझते हो क्या साब
and this is for electrical engine amezing fact
Monday, July 23, 2012
मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते,
लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने
लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का
समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने
जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी
को बनाया. प्रणब मुखर्जी, जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे, एक ऐसे जीओएम के भी
अध्यक्ष बन गए, जिसका काम था बाक़ी सारे जीओएम से काम कराना, क्योंकि मंत्री
जीओएम के लिए समय नहीं देते थे. मुझे नहीं पता कि ऐसे किसी भी जीओएम ने
कोई अनुशंसा की हो, जिसके अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी रहे हों, क्योंकि उनके पास
स्वयं जीओएम की बैठकों को किसी तार्किक अंत तक ले जाने का समय नहीं था.
प्रणब मुखर्जी के अपने मंत्रालय में कितने हल्के ढंग से विचार होता था और
जिसके ऊपर समय देना प्रणब मुखर्जी मुनासिब नहीं समझते थे, उसका एक उदाहरण
मुद्रास्फीति है. प्रणब मुखर्जी का मानना था कि इन्फ्लेशन इज़ ए सिस्टमेटिक
अप्रोच. इट्स ए बास्केट ऑफ गुड्स. उन्होंने कभी मुद्रास्फीति पर हमला
नहीं किया, व्यवस्था पर हमला किया. वित्त मंत्रालय यह समझ नहीं पाया कि
मुद्रा आपूर्ति ज़्यादा होने से मुद्रास्फीति बढ़ी है या फिर वस्तुओं की कमी
की वजह से. हक़ीक़त यह थी कि औद्योगिक विकास कम हो रहा था. भारत के अपने
औद्योगिक विकास की दर नीचे जा रही थी. आवश्यक वस्तुओं की कमी हो रही थी,
जिसकी वजह से मुद्रास्फीति बढ़ी. सरकार अपनी महान बुद्धिमानी से महंगाई कैसे
बढ़ाती है, इसका उदाहरण है आयरन ओर (लौह अयस्क) और स्टील. हमारा आयरन ओर
ज़्यादा से ज़्यादा चीन जा रहा था. सरकार ने तय किया कि उसे चीन नहीं भेजना
है तो उसके लिए उसने सीधा रास्ता न लेकर रेलवे के किराए में 300 प्रतिशत की
वृद्धि कर दी. इससे आयरन ओर चीन जाने से तो रुक गया, लेकिन सरकार ने यह
नहीं सोचा कि इसकी वजह से आयरन ओर हिंदुस्तान की फैक्ट्रियों में भी नहीं
जाएगा. इसका असर टाटा, राउरकेला आदि जगहों में स्थित हिंदुस्तान की सारी
स्टील फैक्ट्रियों पर पड़ा और इसकी वजह से आयरन ओर का काम करने वाले, खासकर
खनन में लगे लोगों की कमर टूट गई. अब हिंदुस्तान में स्टील बनना कम हो गया,
स्टील अब चीन से आ रहा है, जो महंगा है और हम वही महंगा स्टील खरीद रहे
हैं. हमने एक उद्योग को मारा. कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि सरकार प्याज़ भी
खा रही है और जूते भी. ठीक यही उदाहरण सीमेंट का है. 50 रुपये की बोरी 400
रुपये तक बिक गई. कारणों को वित्त मंत्रालय ने दूर नहीं किया.
वित्त मंत्रालय से जुड़ी हुई संस्थाएं, चाहे वह आरबीआई हो या दूसरी संस्थाएं, किसी के पास भी सही आंकड़ा नहीं है कि कुल काला धन कितना है. कोई 4 लाख करोड़ रुपये कह रहा है तो कोई 8 लाख करोड़ तो कोई 10 लाख करोड़ और आरबीआई इसे 30 लाख करोड़ बता रहा है. सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि वित्त मंत्रालय काले धन के ऊपर गंभीर नहीं है. वित्त मंत्रालय का सबसे मज़ेदार विरोधाभास नक़ली नोटों को लेकर है. वैसे तो एक कमाल यह हुआ कि नक़ली नोट हिंदुस्तान के रिजर्व बैंक की ट्रेजरी में पाए गए. उसकी सीबीआई जांच हुई, छापे पड़े, लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, कुछ पता नहीं. यह भी पता चला कि रिजर्व बैंक से नक़ली नोट बैंकों में भेजे गए. इसके ऊपर वित्त मंत्रालय ने कितना ध्यान दिया, हमें नहीं पता, लेकिन हमें इतना पता है कि वित्त मंत्रालय ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारी बातें विरोधाभासी लग सकती हैं, पर सच यही है. दूसरी चीज़ यह कि नक़ली नोट के बारे में पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने बयान दिया था कि हिंदुस्तान में जितनी करेंसी मौजूद है, उसमें हर तीसरा नोट नक़ली है. सरकार जब ऐसा बयान देती है तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा अर्थतंत्र, हमारा वित्त मंत्रालय कितना सजग है. उसने इसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया.
आपके सामने एक घटना रखते हैं. आपके सामने इम्तिहान पास करने के दो तरीक़े हैं. दोनों ही तरीक़ों से नंबर बराबर आते हैं. पहला तरीक़ा है कि आप रट्टा मारें और इतने ज़्यादा जवाब रट लें कि आपके सवाल का उत्तर सही हो और आपके 90 नंबर आ जाएं. दूसरा तरीक़ा है कि आपके पास ज्ञान इतना हो कि आपके पास जो सवाल आए, उसका समझ कर उत्तर दें. जवाब वही होगा और आपको भी 90 नंबर ही मिलेंगे. पर गाड़ी तब फंसती है, जब कहीं पर मुश्किल सवाल आ जाए. ऐसा सवाल, जिसका रट्टा नहीं मारा गया हो और तब ज्ञान वाला आदमी पास हो जाता है और रट्टे वाला रुक जाता है. अब तक हमारे देश में साधारण सवाल थे, साधारण समस्याएं थीं, तो हमारे आईएएस एवं मंत्रीगण रट्टा मारकर उनका हल निकालते रहे (चूंकि रट्टा मारकर पास हुए थे), लेकिन अब समस्या टेढ़ी हो गई और सवाल टेढ़ा हो गया, तो अब वे बग़लें झांक रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि वित्त मंत्री भी रट्टा मारकर पास हुए हैं, पर उनकी गतिविधियां यह बताती हैं या उनके तरीक़े यह बताते हैं कि वह भी रट्टा मारकर पास हुए, इसलिए इस समय लड़खड़ा रहे हैं. अजीब फैसले लेते हैं, सीआरआर कम करते हैं, मुद्रा प्रवाह बढ़ जाता है. ज़्यादा पैसे आ जाते हैं, महंगाई बढ़ जाती है. उसे संभालने के लिए एसएलआर कम करते हैं. ज्वैलरी पर एक प्रतिशत टैक्स लगा दिया. फैसला ऐसा किया कि उस एक प्रतिशत का असेसमेंट आपने इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया. सारे देश में आंदोलन हुआ. किसी को एक प्रतिशत टैक्स देने में ऐतराज़ नहीं था, लेकिन उसके असेसमेंट के लिए आपने जो इंस्पेक्टर लगा दिया, उस पर ऐतराज़ था.
उसी तरह से लोकसभा में पहली बार, शायद विश्व में पहली बार एक शब्द आया, सेंस ऑफ हाउस. जब अन्ना हजारे के अनशन के समय लोकसभा बुलाई गई तो दादा ने सेंस ऑफ हाउस की रणनीति बनाई और कहा कि लोकपाल बिल पास करेंगे. सदन की उस महत्वपूर्ण बैठक को मुख्यतय: प्रणब मुखर्जी ने ही संभाला. पहली बार या तो सरकार ने लोकसभा की बात यानी सेंस ऑफ हाउस को नहीं माना या लोकसभा ने देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की, अपने ही सेंस को एक्शन में ट्रांसलेट नहीं किया. अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है. लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि वित्त मंत्रालय से प्रणब मुखर्जी को मुक्ति मिल गई. अब प्रणब मुखर्जी देश की तंदुरुस्ती के ऊपर नज़र रखेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके जाते ही यह बयान दिया कि आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए एनिमल स्पिरिट की ज़रूरत है. इस बयान का भाष्य अभी तक प्रधानमंत्री की तऱफ से नहीं आया है. हम उस भाष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
वित्त मंत्रालय से जुड़ी हुई संस्थाएं, चाहे वह आरबीआई हो या दूसरी संस्थाएं, किसी के पास भी सही आंकड़ा नहीं है कि कुल काला धन कितना है. कोई 4 लाख करोड़ रुपये कह रहा है तो कोई 8 लाख करोड़ तो कोई 10 लाख करोड़ और आरबीआई इसे 30 लाख करोड़ बता रहा है. सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि वित्त मंत्रालय काले धन के ऊपर गंभीर नहीं है. वित्त मंत्रालय का सबसे मज़ेदार विरोधाभास नक़ली नोटों को लेकर है. वैसे तो एक कमाल यह हुआ कि नक़ली नोट हिंदुस्तान के रिजर्व बैंक की ट्रेजरी में पाए गए. उसकी सीबीआई जांच हुई, छापे पड़े, लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन उसके बाद क्या कार्रवाई हुई, कुछ पता नहीं. यह भी पता चला कि रिजर्व बैंक से नक़ली नोट बैंकों में भेजे गए. इसके ऊपर वित्त मंत्रालय ने कितना ध्यान दिया, हमें नहीं पता, लेकिन हमें इतना पता है कि वित्त मंत्रालय ने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारी बातें विरोधाभासी लग सकती हैं, पर सच यही है. दूसरी चीज़ यह कि नक़ली नोट के बारे में पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने बयान दिया था कि हिंदुस्तान में जितनी करेंसी मौजूद है, उसमें हर तीसरा नोट नक़ली है. सरकार जब ऐसा बयान देती है तो हमें जान लेना चाहिए कि हमारा अर्थतंत्र, हमारा वित्त मंत्रालय कितना सजग है. उसने इसे रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया.
आपके सामने एक घटना रखते हैं. आपके सामने इम्तिहान पास करने के दो तरीक़े हैं. दोनों ही तरीक़ों से नंबर बराबर आते हैं. पहला तरीक़ा है कि आप रट्टा मारें और इतने ज़्यादा जवाब रट लें कि आपके सवाल का उत्तर सही हो और आपके 90 नंबर आ जाएं. दूसरा तरीक़ा है कि आपके पास ज्ञान इतना हो कि आपके पास जो सवाल आए, उसका समझ कर उत्तर दें. जवाब वही होगा और आपको भी 90 नंबर ही मिलेंगे. पर गाड़ी तब फंसती है, जब कहीं पर मुश्किल सवाल आ जाए. ऐसा सवाल, जिसका रट्टा नहीं मारा गया हो और तब ज्ञान वाला आदमी पास हो जाता है और रट्टे वाला रुक जाता है. अब तक हमारे देश में साधारण सवाल थे, साधारण समस्याएं थीं, तो हमारे आईएएस एवं मंत्रीगण रट्टा मारकर उनका हल निकालते रहे (चूंकि रट्टा मारकर पास हुए थे), लेकिन अब समस्या टेढ़ी हो गई और सवाल टेढ़ा हो गया, तो अब वे बग़लें झांक रहे हैं. मैं यह नहीं कहता कि वित्त मंत्री भी रट्टा मारकर पास हुए हैं, पर उनकी गतिविधियां यह बताती हैं या उनके तरीक़े यह बताते हैं कि वह भी रट्टा मारकर पास हुए, इसलिए इस समय लड़खड़ा रहे हैं. अजीब फैसले लेते हैं, सीआरआर कम करते हैं, मुद्रा प्रवाह बढ़ जाता है. ज़्यादा पैसे आ जाते हैं, महंगाई बढ़ जाती है. उसे संभालने के लिए एसएलआर कम करते हैं. ज्वैलरी पर एक प्रतिशत टैक्स लगा दिया. फैसला ऐसा किया कि उस एक प्रतिशत का असेसमेंट आपने इंस्पेक्टर पर छोड़ दिया. सारे देश में आंदोलन हुआ. किसी को एक प्रतिशत टैक्स देने में ऐतराज़ नहीं था, लेकिन उसके असेसमेंट के लिए आपने जो इंस्पेक्टर लगा दिया, उस पर ऐतराज़ था.
उसी तरह से लोकसभा में पहली बार, शायद विश्व में पहली बार एक शब्द आया, सेंस ऑफ हाउस. जब अन्ना हजारे के अनशन के समय लोकसभा बुलाई गई तो दादा ने सेंस ऑफ हाउस की रणनीति बनाई और कहा कि लोकपाल बिल पास करेंगे. सदन की उस महत्वपूर्ण बैठक को मुख्यतय: प्रणब मुखर्जी ने ही संभाला. पहली बार या तो सरकार ने लोकसभा की बात यानी सेंस ऑफ हाउस को नहीं माना या लोकसभा ने देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की, अपने ही सेंस को एक्शन में ट्रांसलेट नहीं किया. अजीब चीज़ यह कि जो स्टैंडिग कमेटी लोकपाल को हैंडिल कर रही थी, उसके चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी एक महिला को जज बनाने की सुपारी लेते हुए कमेटी से बाहर हो गए. उन्होंने इस्ती़फा दे दिया. इस उठापटक में प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कौशल दिखाई देता है. आर्थिक मामलों में उनकी पहल बहुत छोटी और भ्रमित यानी कन्फ्यूज्ड दिखाई देती है. लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि वित्त मंत्रालय से प्रणब मुखर्जी को मुक्ति मिल गई. अब प्रणब मुखर्जी देश की तंदुरुस्ती के ऊपर नज़र रखेंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके जाते ही यह बयान दिया कि आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए एनिमल स्पिरिट की ज़रूरत है. इस बयान का भाष्य अभी तक प्रधानमंत्री की तऱफ से नहीं आया है. हम उस भाष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
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